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नए कॉलेज का पहला दिन


                                                                एपिसोड- 10 

पिछले भाग में आपने पड़ा ,

मैं ऊपर जाकर थोड़ी देर लेट जाती हूँ।” पापा कुछ देर उसे देखते रहे, जैसे कुछ समझने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन बोले नहीं। गणिका उठकर सीढ़ियाँ चढ़ने लगी, और कोमल उसके साथ-साथ तैरती हुई बोली “दीदी, अब हम कब जायेंगे मेरे परिवार को ढूंढने।  गणिका ने बस धीमे से कहा “चुप रहो… कमरे में चलकर बात करते हैं।”

अब आगे ,
गणिका जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ चढ़कर अपने कमरे में गई और दरवाज़ा बंद कर दिया। पूरी सुबह की थकान और टेंशन जैसे अचानक उसके चेहरे पर उतर आई थी। वह पलंग पर बैठते ही गहरी साँस लेकर चुप हो गई। कोमल उसके पास तैरकर आई और बोली, “दीदी… अब तो बताओ न। हम कब चलेंगे मेरे परिवार को ढूँढने?” उसकी आवाज़ में मासूमियत भी थी और बेचैनी भी।
गणिका ने थककर कहा, “कोमल, अभी मुझसे कुछ मत पूछो। मैं खुद नहीं समझ पा रही कि क्या हो रहा है। सुबह जो हुआ… वो सब अजीब था।” कोमल ने धीरे से कहा, “तुम उस अजनबी लड़के के बारे में सोच रही हो।” यह सुनकर गणिका चौंक गई और तुरंत बोली, “कोमल! पागल मत बनो। मैं क्यों सोचूँगी उसके बारे में?”
कोमल ने आँखें छोटी कीं। “तो फिर तुम्हारा दिल इतनी तेज़ क्यों धड़का था? तुम उसे ऐसे क्यों देख रही थी?” गणिका ने उसे रोक दिया—“बस! एक शब्द और मत कहना। मुझे नहीं पता वो कौन था और कैसे गायब हुआ।”
कमरे में कुछ पल की चुप्पी फैल गई। गणिका खिड़की की तरफ देखने लगी, जैसे मन अभी तक वहाँ अटका हुआ हो जहाँ से सब शुरू हुआ था।
कोमल उसके पास बैठी और पूछा, “दीदी, क्या तुम्हें डर लग रहा है?” गणिका ने धीमे से सिर हिलाया। “हाँ कोमल… डर तो लग रहा है। समझ नहीं आ रहा कि कहाँ से शुरू करूँ। तुम्हारे परिवार को भी खोजना है। मैं थक गई हूँ थोड़ी देर सो जाती हूँ। मुझे सोने दो प्लीज थोड़ी देर। फिर मुझे कॉलेज भी जाना है।
गणिका MIAM के गेट पर खड़ी थी, उसका चेहरा थोड़ा उतरा हुआ था। बैग ठीक करते हुए वह हल्की झुंझलाहट के साथ बुदबुदाई, “हे महादेव… एक और नया कॉलेज। तुम तो मेरे बेस्ट फ्रेंड हो ना? फिर भी इतना घूमाते रहते हो मुझे।” वह धीरे से मुस्कुराई, पर मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँची।
वह एक लंबी साँस लेकर बोली, “बस महादेव… इस बार कुछ गड़बड़ मत करवाना। यहाँ सब ठीक-ठाक चल जाए… प्लीज़।” कोमल उसके पास तैर रही थी, लेकिन गणिका अपनी ही दुनिया में बोलती जा रही थी—“वैसे भी, मैं जो भी कहती हूँ, तुम्हें सुनाई कहाँ देता है…”
कॉलेज के बोर्ड को देखकर उसने धीमे से कहा, “चलो… शुरू करते हैं। उम्मीद है ये भी पिछले कॉलेजों जैसा नहीं निकलेगा।”
गणिका जैसे ही मनाली इंस्टीट्यूट ऑफ आर्ट्स एंड मीडिया (MIAM) के बड़े से गेट में दाखिल हुई, ठंडी हवा उसके चेहरे से टकराई। पाइन के पेड़ों की खुशबू, बच्चों की चहल-पहल और चारों तरफ़ फैली धूप… सब कुछ खूबसूरत था, बस गणिका का मन थोड़ा भारी था। एक और नया कॉलेज। एक और नई शुरुआत।
उसने धीमे से बुदबुदाया—
“हे महादेव… इतनी बार कॉलेज बदलवाए हैं आपने। अब तो कुछ गड़बड़ मत करवाना। प्लीज़…”
पीछे कोमल तैरते हुए बोली,
“दीदी, इस बार सब अच्छा होगा… मैं हूँ न!”
गणिका ने उसे घूरकर देखा—
“बस यहाँ चुप रहना, किसी को परेशान मत करना।”
गेट से आगे बढ़ते ही MIAM की असली दुनिया सामने आ गई—स्टूडियो में लाइटें चमक रही थीं, कोई कैमरा सेट कर रहा था, कोई स्क्रिप्ट पढ़ रहा था। म्यूज़िक डिपार्टमेंट वाला लड़का गिटार पर धुन बजा रहा था।
गणिका ने मन ही मन सोचा—
“शायद… शायद ये जगह बाकी जगहों से अलग हो पाए।”
तभी—
एक लड़का तेजी से आते हुए उससे टकरा गया।
गणिका एक कदम पीछे हुई।
लड़का हड़बड़ा कर बोला—
“ओह सॉरी! तुम नई हो ना? मैं नील हूँ… MIAM का अनऑफिशियल वेलकम बॉय!”
उसके बोलने का तरीका इतना तेज़ था कि गणिका को समझने में एक पल लगा।
गले में कैमरा, कंधे पर बैग और चेहरे पर बड़ी-सी मुस्कान—
नील एकदम बिजली जैसा लड़का था।
वह खुद ही बोला—
“पहला दिन? Nervous? Don’t worry! मैं हूँ ना आप की service में!”
कोमल कान में फुसफुसाई—
“दीदी, ये तो बहुत बोलता है… इससे दूर रहो!”
गणिका बिना कुछ कहे आगे बढ़ने लगी,
लेकिन नील फिर उसके बराबर आ गया—
“अच्छा, तुम कौन-से डिपार्टमेंट में हो? मुझे पता है तुम Arts में लगती हो। शायद Psychology? सही कहा ना?”
गणिका के जवाब देने से पहले ही किसी ने पीछे से आवाज़ लगाई—
“नील! तू नए लोगों को पहली ही दिन परेशान कर देता है!”
गणिका पीछे मुड़ी—यह सिया थी।
सिया एकदम चुलबुली, तेज़ बोलने वाली और बेझिझक लड़की थी।
उसके हाथ में कॉफी और आँखों में शरारत थी।
वह पास आकर बोली—
“हाय! मैं सिया हूँ। यहाँ सब मुझे जानते हैं। और नील को भी… इसलिए इसे ज़्यादा serious मत लेना।”
गणिका हल्का मुस्कुराई।
काफी दिनों बाद किसी ने उसे ऐसा warm welcome दिया था।
उन दोनों के साथ धीरे-धीरे एक और लड़की आई—निशा।
सीधे बाल, शांत चेहरा और आँखों में गहराई।
निशा ने धीरे से कहा—
“अगर कुछ चाहिए हो… तो बता देना। यह जगह नई है, पर लोग अच्छे हैं।”
सिया तुरंत बीच में कूदी—
“और हम तेरे friends officially बन चुके हैं!”
कोमल खुशी से उछल पड़ी—
“दीदी, ये दोनों अच्छी हैं… इनसे दोस्ती कर लो!”
नील ने ताली बजाकर कहा—
“चलो! अब मैं आपको MIAM का पूरा tour दूँगा। यहाँ का कैंटीन, स्टूडियो, गार्डन—सब दिखाऊँगा!”
सिया ने उसे धक्का देकर कहा—
“चुप! पहले क्लास में चलने दो। Tour बाद में।”
सब एक साथ चलने लगे।
MIAM का माहौल अब गणिका को अजीब नहीं लग रहा था।
नील सामने उछलता-कूदता जा रहा था,
सिया jokes सुना रही थी,
निशा शांति से साथ चल रही थी,
और कोमल हर कमरे में झांककर excited हो रही थी।
गणिका ने धीरे-से सोचा—
“शायद… इस बार महादेव मेरी सुन लें।”
उसे नहीं पता था कि उसकी जिंदगी में नया college, नए दोस्त ही नहीं…
कुछ बहुत बड़ा, बहुत अलग भी आने वाला है।
बस उसकी किस्मत इंतज़ार कर रही थी
किसी एक सही पल का…
एक हफ्ते बाद ,
पूरे एक हफ़्ते में IAM का माहौल गणिका के लिए बिल्कुल नया होते हुए भी धीरे-धीरे अपना-सा लगने लगा। शुरुआत में वह थोड़ी चुप रहती थी, लेकिन सिया की चुलबुली बातें, निशा की शांत समझदारी और नील की हर समय चलने वाली बक-बक ने उसके आसपास एक ऐसा घेरा बना दिया जिसमें अकेलापन टिक ही नहीं पाया। सिया हर ब्रेक में उसका हाथ पकड़कर कैंटीन ले जाती, निशा क्लास में उसके बगल में बैठती और नील रोज़ नए बहाने बनाकर उसे हँसाने की कोशिश करता—कभी कैमरे के पीछे से अचानक “smile!” कहकर फोटो खींच लेता तो कभी स्टूडियो में उसका नाम गलत पुकारकर उसे चिढ़ाता। धीरे-धीरे सब उसे “अपनी” समझने लगे। एक हफ़्ते बाद गणिका खुद को इस कॉलेज का हिस्सा महसूस करने लगी थी—सुबह क्लास की जल्दी, कैंटीन के आलू परांठे, नील की नॉन-स्टॉप बातें, सिया के मज़े, निशा की शांति… और इन सबके बीच कोमल हर वक्त उसके साथ मंडराती, कभी-कभी फुसफुसाकर कहती, “दीदी, अच्छा है न? इस बार तुझे दोस्त मिल गए…” गणिका मुस्कुराकर जवाब देती, “हाँ… शायद इस बार सब ठीक हो जाए।” उसे पता नहीं था कि ये हफ़्ते की शांति… बहुत जल्दी बदलने वाली थी।
सुबह-सुबह गणिका IAM पहुँची थी।
आज उसे अपना असाइनमेंट सबमिट करना था।
वह बैग से शीट्स निकालते हुए बिना आगे देखे तेज़ी से चल रही थी—
मन पूरी तरह काम में लगा हुआ, ध्यान कहीं और।
उसी समय, सामने से रोहन आ रहा था।
सिर्फ दो ही दिन हुए थे उसे कॉलेज जॉइन किए,
लेकिन आज उसके चेहरे पर अजीब-सी मुस्कान थी—
जैसे वह जान-बूझकर रास्ता रोक रहा हो।
वह सीधा गणिका की ओर बढ़ा…
और तेज़ झटके से उससे टकरा गया।
गणिका का संतुलन बिगड़ गया—
वह सीधा साइड में रखे भारी मिट्टी के गमले पर गिरने वाली थी।
पर तभी—
एक तेज़, मजबूत हाथ ने उसका हाथ पकड़ा
और उसे अपनी तरफ खींच लिया।
पलक झपकते ही गणिका किसी के बेहद करीब थी।
अगर वह हाथ न थामता—
उसका सिर सीधे गमले के कोने से टकरा जाता।
गणिका डर के मारे काँप उठी।
उसका दिल इतनी तेज़ धड़कने लगा कि वह अनजाने में उस शख्स की छाती से
और फिर उसके गले से चिपक गई।
कुछ सेकंड तक वह उसी तरह चिपकी रही—
डरी हुई, साँसें उखड़ी हुई।
थोड़ी देर बाद,
जब उसे एहसास हुआ कि वह किसी अजनबी को पकड़े हुए है,
उसने धीरे-धीरे उठकर उसकी तरफ देखा।
वह शख्स लम्बा था,
काले कपड़ों में,
और चेहरे पर मास्क लगा हुआ।
लेकिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात—
उसकी आँखें… नीली थीं।
और वह चमक…
वही चमक थी।
जो गणिका ने कहीं पहले देखी थी।
गणिका कुछ कह पाती, उससे पहले—
वह शख्स एकदम शांत,
बिना किसी प्रतिक्रिया के,
तेज़ कदमों से वहाँ से चला गया।
उसने पलटकर एक बार भी नहीं देखा।
गणिका बस वहीं खड़ी रह गई—
हैरान…
डरी हुई…
और उस नीली आँखों की चमक में खोई हुई।
आख़िर कौन था वह?
फिर वही?

या कोई और?
उधर कॉलेज में खबर फैल गई—
साइकोलॉजी के प्रोफ़ेसर बिन्नू बसोर ने अचानक नौकरी छोड़ दी है।
पूरा IAM चर्चा में था,
क्योंकि उनकी जगह अब किसी “नए प्रोफ़ेसर” का आना तय था…
और किसी को भी अंदाज़ा नहीं था
कि वह कौन है
या उसके आने से क्या बदलने वाला है।

 तो दोस्तों कैसा लगा आपको आज का ये एपिसोड ? जरूर बताइएगा मिलते आपसे अगले एपिसोड में

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Sirf Sadharan

Pro
जहाँ वास्तविकता खत्म होती है, वहीं से कल्पनाओं की दुनिया शुरू होती है… आपका स्वागत है।