05

मिलिए गणिका से

                                                                     एपिसोड- 5

पिछले एपिसोड में आपने पड़ा ,

एक सबसे रहस्यमयी युवा बिज़नेस टाइकून,
जो खुद भी नहीं जानता
कि उसके दादा क्यों और किस लिए उसे बुला रहे हैं।
दूसरी और एक साधक लड़की,
जो साधारण दिखती है,
लेकिन जिसकी आत्मा में सालों पुराना बंधन जाग रहा है।
दोनों अलग-अलग रास्तों से
एक ही दिशा में आगे बढ़ रहे थे—
मनाली।
जहाँ न सिर्फ उनकी राहें मिलनी थीं,
बल्कि उनकी किस्मतें…
राज़…
और उन आत्माओं की परछाइयाँ—
सब एक जगह आने वाली थीं।
और यह संयोग नहीं था।
यह किसी अदृश्य योजना का हिस्सा था।
अगर आप चाहें तो
मैं अगला हिस्सा आगे बढ़ाऊँ, जहाँ—
अभिनव मनाली पहुँचकर दादा से पहली मुलाकात करेगा
गणिका मनाली की सीमा पार करते ही “किसी अनजानी आत्मा” से टकराएगी

अब आगे ,
ट्रेन मनाली की ओर बढ़ रही थी। खिड़की के बाहर पहाड़ों की ठंडी हवा और तेज़ी से पीछे छूटते नज़ारे एक अजीब सी शांति दे रहे थे। स्वाति अपनी सीट पर आराम से बैठी मोबाइल पर वीडियो देख रही थी, जबकि उसके ठीक पास बैठी गणिका खामोश थी। चेहरे पर हल्का डर और मासूम असहजता—लेकिन यह डर असली नहीं था। गणिका अपने भीतर छुपी शक्तियों को दुनिया से छुपाने के लिए अक्सर ऐसी ही “डरी हुई” बच्ची बनने का अभिनय करती थी। असल में वह बेहद बहादुर, संवेदनशील और मजबूत लड़की थी।
इसी अभिनय के बीच अचानक गणिका की नज़र ट्रेन के खाली गलियारे पर पड़ी। वहाँ एक 8 साल की छोटी बच्ची खड़ी थी पतली चोटी, हल्का-सा फ्रॉक, नंगे पैर और हाथ में एक गुड़िया। बच्ची इतनी शांत थी कि कोई भी उसे देखकर डर जाए, लेकिन गणिका सिर्फ धीरे से सीधी बैठ गई। वह बच्ची ट्रेन की सीट पर नहीं, बल्कि फर्श पर खड़ी थी… और सबसे खास बात—उसे सिर्फ गणिका देख सकती थी, स्वाति नहीं।
गणिका ने धीरे से पूछा, “हैलो… तुम कौन हो?” बच्ची ने डरते हुए आँखें उठाईं और काँपती आवाज़ में बोली, “मेरा नाम कोमल है… मैं अपनी मम्मी को ढूँढ रही हूँ। क्या तुमने उन्हें देखा?” गणिका के अंदर दया उमड़ी। उसने बेहद कोमल आवाज़ में पूछा, “तुम कब खोई थीं?” कोमल ने अपनी गुड़िया को कसकर पकड़ा और बोली, “मैं पाँच साल पहले… इसी ट्रेन में खो गई थी।” गणिका की भौंहें सिकुड़ गईं। “फिर क्या हुआ?”
कोमल की आँखों से आँसू बहने लगे। “मैं सीट ढूँढते-ढूँढते दरवाज़े तक चली गई थी… ट्रेन चल रही थी… मुझे लगा मम्मी इसी स्टेशन पर होंगी… मैं उतरना चाहती थी…” उसकी आवाज़ टूट गई। “लेकिन मेरा पैर फिसल गया… और मैं गिर गई…” गणिका के दिल में दर्द की ठंडी लहर दौड़ गई। वह धीरे से बोली, “तुम… बच नहीं पाई?” कोमल ने सिर हिलाया। “नहीं… मैं वापस नहीं उठी। पाँच साल हो गए… मैं अपने घर नहीं जा पाई… मेरी मम्मी-पापा को नहीं पता कि मैं अब जिंदा नहीं हूँ…”
गणिका ने पलकें झपकाई। डरने का अभिनय करने वाली लड़की अचानक पूरी गंभीरता में आ गई। उसकी आँखें बेहद नरम होकर कोमल पर टिक गईं। “तुम मुझसे क्या चाहती हो, कोमल?” बच्ची ने आँसू पोंछे और बोली, “मुझे… अपने घर जाना है। मुझे अपनी मम्मी को बताना है कि मैं अब उनके पास नहीं लौटूँगी… मैं पाँच साल से उनका इंतज़ार कर रही हूँ…” गणिका ने बिना एक शब्द बोले दिल से फैसला कर लिया। “मैं तुम्हें घर ले चलूँगी,” उसने बहुत दृढ़ता से कहा। कोमल की आँखों में पहली बार आशा की छोटी सी चमक आई।
उसी पल ट्रेन अंधेरी सुरंग में दाखिल हुई। रोशनी झपकी, डिब्बा काला हुआ… और जैसे ही सुरंग खत्म हुई, कोमल गायब। गणिका ने हल्की सी साँस छोड़ी। स्वाति ने हँसते हुए पूछा, “क्या हुआ? तू तो ऐसे बैठी है जैसे भूत देख लिया!” गणिका ने अपने अभिनय वाला मासूम डर चेहरे पर रखते हुए कहा, “न…नहीं, बस… थोड़ी अजीब हवा लगी।” लेकिन अंदर से वह बिल्कुल नहीं डरी थी। वह तैयार थी। और उसे पता था—आज का सफर केवल मनाली का नहीं, बल्कि एक खोई हुई बच्ची को उसके घर तक पहुँचाने का भी है।
“मनाली का सबसे आलीशान होटल”
मनाली की ठंडी हवा तेज़ होती जा रही थी। पहाड़ों के चौड़े रास्तों पर लंबी–लंबी चीड़ के पेड़ सरसराहट के साथ स्वागत कर रहे थे। शाम ढल चुकी थी और अंधेरों में शहर की पीली रोशनियाँ चमकने लगी थीं। इसी शांत माहौल को अचानक एक गहरी, दमदार हैडलाइट की लकीर ने चीर दिया — एक प्रीमियम ब्लैक SUV दौड़ती हुई मनाली के सबसे महंगे फाइव–स्टार होटल “Royal Crest Heights” के बाहर आकर रुकी।
SUV की टिंटेड खिड़कियों पर होटल की सुनहरी बाहरी लाइटें पड़कर चमक उठीं। गार्ड तुरंत सतर्क मुद्रा में खड़े हो गए — क्योंकि ऐसी गाड़ियों का काफिला यहाँ रोज़ नहीं रुकता था। कार का नंबर “9 20 — Delhi registration” साफ़ दिख रहा था, लेकिन असली पहचान तो कार के फिज़िकल प्रेज़ेंस में छुपी थी। यह इतनी प्रीमियम थी कि किसी राजनीतिक परिवार, किसी बड़े उद्योगपति या VVIP के आने का अंदाज़ा तुरंत हो जाता।
SUV धीरे से रुकी। उसके रुकते ही होटल के मेन गेट के पास तैनात मैनेजर और दो स्टाफ़ फुर्ती से बाहर आए। जैसे वे पहले से जानते हों कि कोई खास मेहमान पहुँच चुका है। कार के चारों तरफ हल्की धुंध फैली हुई थी, पहाड़ों की ठंडी रात इसका असर और खूबसूरत बना रही थी।
कुछ सेकंड तक कार का दरवाज़ा नहीं खुला।
एक अजीब सा सस्पेंस हवा में तैर गया।
कई नज़रें उस कार की ओर उठ चुकी थीं।
फिर…
धीरे-धीरे SUV का पिछला दरवाज़ा खुला।
एक पॉलिश्ड ब्लैक शू बाहर आया।
फिर लंबा, शांत, बेहद क्लासी कदम।
और उसी क्षण —
होटल की हवा एक पल को थम-सी गई।
अभिनव भसीन।
काला कोट, मैट्रिकुलर फिट, चेहरे पर हल्की छाया, आँखों पर काला फ्रेम…
और वही रहस्यमय आभा जो किसी भीड़ में तुरंत अलग दिख जाती है।
अभिनव ने गहरी ठंडी हवा को साँस में भरा।
उसके चेहरे पर न कोई उत्साह था, न थकान —
बस एक अजीब-सी बेचैनी,
जैसे पहाड़ों की यह शांति भी उसके भीतर की उथल-पुथल को शांत नहीं कर पा रही हो।
होटल मैनेजर तुरंत करीब आया,
“Welcome to Royal Crest Heights, Mr. Bhaseen.
Your suite is ready.”
अभिनव बस हल्का सिर हिलाकर आगे बढ़ गया—
बिना किसी को देखे,
बिना मुस्कुराए,
बिना कुछ कहे।
लेकिन अंदर ही अंदर
उसके मन में एक ही सवाल लगातार गूंज रहा था—
“आख़िर दादाजी ने इतने साल बाद मुझे यहाँ क्यों बुलाया?”
हवा में छुपी पहाड़ी ठंड उसके आसपास अजीब ढंग से घूम रही थी।
मानो मनाली की यह रात,
इस होटल का यह शांत लॉबी,
और उसका यह रहस्यमय आगमन —
किसी बड़ी कहानी की शुरुआत हो।
और शायद…
उसी समय,
कहीं दूर ट्रेन में बैठी गणिका भी मनाली की ओर बढ़ रही थी।
दोनों अलग यात्राओं पर थे,
लेकिन उनकी मंज़िल —
अब एक होने वाली थी।
अभिनव जैसे ही होटल के अंदर कदम रखता है,
Royal Crest Heights की गर्म सुनहरी रोशनी
उसके चेहरे पर हल्का-सा तेज़ डालती है।
होटल का बड़ा, ग्लास–और–वुड मिलाकर बना भव्य एंट्रेंस
पहाड़ियों की ठंडी रात में एकदम शाही लगता था।
लॉबी में आते ही
दो कर्मचारियों ने तुरंत हाथ जोड़कर नमन किया।
पर असली दिलचस्प बात यह थी—
लोग उसे नहीं पहचान रहे थे।
वो पहचान रहे थे तन्मय को।
क्योंकि इंटरनेट, मीडिया, और बिज़नेस सर्कल्स में
एक गलतफहमी फैल चुकी थी—
⭐ “तन्मय प्रताप ही असली अभिनव भसीन है।”
इस झूठ को हवा किसने दी थी?
न्यूज़ चैनलों ने।
पापराज़ी ने।
और कुछ हद तक…
तन्मय की बेपरवाही ने।
तन्मय, अभिनव का मैनेजर, बेस्ट फ्रेंड और बचपन का साथी।
दोनों एक–दूसरे पर जान छिड़कते थे।
लेकिन दुनिया—
कई सालों से तन्मय को ही “Mysterious Billionaire” मान चुकी थी।
क्योंकि असली अभिनव कभी कैमरे के सामने आया ही नहीं।
तन्मय आया।
और दुनिया को लगा—
“बस यही है असली चेहरा।”
⭐ होटल में भी यही गलतफहमी
जैसे ही दोनों होटल में दाखिल हुए,
दोनों तरफ स्टाफ़, मैनेजर और सिक्योरिटी लाइन में खड़े हो गए।
लेकिन हर कोई
तन्मय की तरफ झुक रहा था—
“Welcome, Mr. Bhasin.”
“Good evening sir.”
“Your suite is ready, Mr. Abhinav.”
अभिनव मुस्कुराया भी नहीं।
न नाराज़ हुआ।
न खुश।
बस चुपचाप आगे बढ़ गया।
क्योंकि उसे आदत थी।
यह पूरे संसार की आदत बन चुकी थी।
तन्मय ने हल्के से अभिनव के कान में कहा—
“Bro! I swear, agar ek aur banda mujhe Abhinav bolega toh main yahin lobby mein chिल्ला पड़ूँगा!”
अभिनव ने बस धीमे से कहा,
“लोग तुम्हें ही पसंद करते हैं।
मुझे परवाह नहीं।”
तन्मय हँस पड़ा—
“परवाह नहीं? तेरे नाम पर सब TRP खा रहे हैं मेरे यार!”
लेकिन मज़ाक के पीछे एक सच्चाई छुपी थी—
तन्मय दुनिया के सामने चेहरा था,
और असली अभिनव—
सिर्फ साया।
⭐ प्रेसिडेंशियल सुइट का एंट्री सीन
होटल स्टाफ़ उन्हें प्रीमियम लिफ्ट की ओर ले गया।
लिफ्ट के गिलास से पूरी मनाली की रात चमक रही थी।
ऊँचे पहाड़ पाइन के पेड़ों के साथ
हल्की धुंध में गुम से लग रहे थे।
लिफ्ट “P — Presidential Floor” पर रुकी।
फ्लोर पर गहरा सन्नाटा था।
सिर्फ एक ही सुइट…
पूरा एक फ्लोर घेरकर।
जिसके दरवाज़े पर गोल्डन नेमप्लेट चमक रही थी—
“Presidential Suite — Mr. Abhinav Bhasin”
तन्मय ने हँसते हुए बोला,
“देख भाई… तेरे नाम का सुइट, मेरी इज़्ज़त।”
अभिनव ने शांत स्वर में कहा,
“सुइट मेरे नाम का है,
इज़्ज़त भी मेरी है…
बस चेहरा तेरा।”
कॉरिडोर में तन्मय की हँसी गूँज गई।
⭐ दरवाज़ा खुलता है — तन्मय की परफेक्ट तैयारी
होटल मैनेजर ने कार्ड टैप किया।
दरवाज़ा खुला…
और सुइट का फर्स्ट व्यू
किसी राजघराने की रॉयल एंट्री जैसा था।
4,000 sq.ft का पूरा फ्लोर—
Italian marble,
मिरर ग्लास वाली दीवारें,
सॉफ्ट गोल्डन लाइट्स,
और दूर—
ग्लास वॉल से दिखती
चाँदनी में नहाई हिमालय की चोटियाँ।
लेकिन इनमें से कोई चीज़
अभिनव को प्रभावित नहीं कर पाई।
क्योंकि उसकी नज़र रुकी—
एक छोटी, पुरानी लकड़ी की मेज़ पर रखे काग़ज़ों पर।
तन्मय आगे बढ़कर बोला—
“सब तेरे लिए सेट करवा दिया है।”
अभिनव ने मेज़ पर पड़े
प्रीमियम फाइल, लकड़ी का बॉक्स, और एंगेजमेंट गिफ्ट्स के पैकेट देखे।
वह ठिठक गया।
“तन्मय… ये सब क्या है?”
तन्मय ने एक लंबी साँस ली।
उसका चेहरा गंभीर हो गया।
“Bro… तेरी माँ ने मुझसे कहा था
कि मैं यहाँ सब ‘शादी की मीटिंग’ के हिसाब से arrange कर दूँ।”
अभिनव का चेहरा सख्त हो गया।
उसकी आँखों में नीली चमक उभर आई—
गहरी… क्रोध से भरी।
पर उसके बोलने से पहले
तन्मय ने हल्का हाथ उसके कंधे पर रखा—
“Relax… पहले सुइट देख ले।
जो बात करनी है, बाद में करेंगे।”
मनाली की ओर आती ट्रेन में गणिका
पहली बार अभिनव की ऊर्जा महसूस करने वाली थी।
दोनों अपने–अपने रास्तों पर…

तो दोस्तों कैसा लगा आपको आज का ये एपिसोड ? जरूर बताइएगा मिलते आपसे अगले एपिसोड में


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Sirf Sadharan

Pro
जहाँ वास्तविकता खत्म होती है, वहीं से कल्पनाओं की दुनिया शुरू होती है… आपका स्वागत है।