32

कोई पास तो कोई दूर

Chapter 33

पिछले एपिसोड में आपने पढ़ा,

"तुम्हें अकेले ये सब नहीं झेलना चाहिए… उस लड़के को बताना होगा।"

उसने आँखें बंद कर लीं।

उसके सामने अचानक वही चेहरा उभर आया…

वही लापरवाह मुस्कान।

वही ठंडी आवाज़।

"तुम मेरे लिए बस एक Chapter थी…"

उसके हाथ में पकड़ी रिपोर्ट काँपने लगी।

उसने धीरे से अपने पेट पर हाथ रखा।

उसकी आँखों से आँसू गिर पड़े।

“अब मैं क्या करूँ…?”

अब आगे.......

सड़क की तेज हवा उसके बालों को उड़ा रही थी, लेकिन उसके भीतर सब कुछ जैसे थम गया था।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह किससे मदद मांगे।

कॉलेज…

दोस्त…

या उस इंसान से…

जिसे उसकी परवाह ही नहीं थी।

उसे अचानक अपनी माँ का चेहरा याद आ गया।

उसकी दुनिया में अगर कोई था… तो सिर्फ उसकी माँ।

एक छोटा-सा किराए का कमरा।

छत से झूलता पुराना पंखा।

दीवारों पर जगह-जगह उखड़ा हुआ प्लास्टर।

वहीं उसकी पूरी दुनिया बसती थी।

उसके पिता बहुत पहले इस दुनिया को छोड़ चुके थे।

तब वह बहुत छोटी थी।

उसकी माँ ने ही उसे माँ और पिता दोनों बनकर पाला था।

सुबह चार बजे उठकर वह घरों में काम करने जाती थी।

कभी बर्तन मांजना…

कभी कपड़े धोना…

कभी किसी के घर खाना बनाना।

दिनभर की मेहनत के बाद भी जब वह घर लौटती, तो उसके चेहरे पर थकान जरूर होती थी… लेकिन आँखों में हमेशा अपनी बेटी के लिए उम्मीद चमकती थी।

“मेरी बेटी पढ़-लिखकर बड़ी अफसर बनेगी…”

वह अक्सर यही कहा करती थी।

इसी उम्मीद के सहारे उसने अपनी हर छोटी-बड़ी जरूरत कुर्बान कर दी थी।

कभी नई साड़ी नहीं खरीदी…

कभी अपने लिए कुछ नहीं लिया।

लेकिन बेटी की किताबें, फीस और पढ़ाई में कभी कमी नहीं आने दी।

और वह भी अपनी माँ की मेहनत को समझती थी।

इसलिए वह हमेशा पढ़ाई में अच्छी थी।

कॉलेज में लोग उसे सीधी और शांत लड़की कहते थे।

लेकिन कोई नहीं जानता था कि उस मुस्कान के पीछे कितनी संघर्ष भरी जिंदगी छुपी है।

क्लिनिक के बाहर खड़ी वह अब भी अपनी रिपोर्ट को कसकर पकड़े हुए थी।

उसकी आँखों में फिर आँसू आ गए।

“माँ…”

उसके होंठों से बहुत धीमी आवाज निकली।

“अगर आपको ये सब पता चला… तो आप टूट जाएँगी…”

उसका दिल जैसे अंदर से कांप उठा।

वह जानती थी…

उसकी माँ ने अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ एक सपने के लिए जी थी—

अपनी बेटी की खुशियों के लिए।

और आज…

वह खुद अपनी जिंदगी के सबसे बड़े अंधेरे के सामने खड़ी थी।

हवा का एक तेज झोंका आया।

उसके हाथ में पकड़ा लिफाफा हल्का सा कांप गया।

उसने उसे अपने सीने से लगा लिया।

जैसे उस कागज के साथ-साथ वह अपनी पूरी जिंदगी को भी संभालने की कोशिश कर रही हो।

लेकिन उसके दिल के अंदर एक सवाल बार-बार उठ रहा था—

अब वह अपनी माँ की आँखों में कैसे देख पाएगी…?

जब वह अपने घर पहुँची, तब तक शाम गहरा चुकी थी।

छोटा-सा किराए का कमरा।

दरवाज़े के पास वही पुरानी लकड़ी की चौखट।

अंदर से उसकी माँ की खाँसी की आवाज़ आ रही थी।

उसने जल्दी से अपनी आँखों के आँसू पोंछ लिए।

दरवाज़ा खोला।

उसकी माँ चूल्हे के पास बैठी रोटियाँ बना रही थी।

उसे देखते ही मुस्कुराईं।

“आ गई बेटा?”

उनकी आवाज़ में हमेशा की तरह वही अपनापन था।

“आज देर हो गई… कॉलेज में बहुत पढ़ाई रही क्या?”

उसने जवाब देने की कोशिश की…

लेकिन गला जैसे बंद हो गया।

“हाँ… बस थोड़ी…”

वह धीरे से बोली।

उसकी माँ ने तुरंत उसकी तरफ गौर से देखा।

“तबीयत ठीक है ना?”

“चेहरा इतना उतरा हुआ क्यों लग रहा है?”

उसने तुरंत नजरें झुका लीं।

“कुछ नहीं माँ… बस थोड़ा थक गई हूँ।”

वह जल्दी से अपने छोटे से कमरे में चली गई।

दरवाज़ा बंद करते ही उसकी सारी हिम्मत टूट गई।

उसने लिफाफा बिस्तर पर फेंक दिया।

और खुद वहीं जमीन पर बैठ गई।

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

लेकिन इस बार वह रो भी नहीं पा रही थी।

जैसे दर्द आँसुओं से भी बड़ा हो गया हो।

रात धीरे-धीरे गहराने लगी।

दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक कमरे में गूंज रही थी।

वह बिस्तर पर बैठी छत को देख रही थी।

उसकी आँखों में नींद नहीं थी।

बस खालीपन था।

उसने धीरे से अपनी रिपोर्ट उठाई।

कागज़ पर लिखी वही लाइन फिर उसकी आँखों के सामने आ गई।

उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा।

“मेरे साथ ही क्यों…” उसके हाथ कांप रहे थे।

उसे अचानक याद आया—

अपनी माँ का चेहरा…

उनकी उम्मीदें…

उनकी मेहनत।

उसने अपने बाल पकड़ लिए।

“नहीं…” उसकी आवाज़ टूट गई।

“अगर माँ को पता चला… तो वो मर जाएँगी…”

उसके सीने में घुटन बढ़ने लगी।

जैसे हवा भी कम पड़ रही हो।

उसने खिड़की खोली।

बाहर रात का अंधेरा फैला हुआ था।

दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आ रही थी।

वह खिड़की के पास खड़ी हो गई।

उसकी आँखें खाली थीं।

उसके मन में एक भयानक ख्याल धीरे-धीरे जन्म लेने लगा।

“शायद…”

वह बुदबुदाई।

“अगर मैं ही इस दुनिया में ना रहूँ…”

तो सबकी परेशानी खत्म हो जाएगी।

उसकी आँखों से फिर आँसू गिरने लगे।

लेकिन इस बार उन आँसुओं में डर नहीं था।

बस थकान थी।

और गहरा अंधेरा।

उसे लगने लगा था…

कि उसकी जिंदगी अब किसी अंधी सुरंग में फँस चुकी है…

जहाँ से बाहर निकलने का रास्ता शायद अब बचा ही नहीं था।

दो हफ्ते बीत चुके थे।

कॉलेज का वही शोर, वही गलियारे, वही भीड़…

सब कुछ पहले जैसा ही था।

लेकिन वह पहले जैसी नहीं रही थी।

उसका चेहरा अब पहले से ज्यादा पीला लगने लगा था। आँखों के नीचे हल्के काले घेरे पड़ गए थे। पहले जो लड़की हमेशा चुप मगर संभली हुई दिखती थी, अब उसकी चाल में भी कमजोरी साफ दिखाई देती थी।

वह हर दिन थोड़ा और कमज़ोर होती जा रही थी।

वहीं दूसरी ओर…

उसके मन का डर अब हर दिन और गहरा होता जा रहा था।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह बेचैनी क्यों बढ़ती जा रही है।

दिन में वह खुद को समझा लेती थी…

लेकिन जैसे ही रात होती, वही सवाल फिर उसके दिल में उठने लगता—

कहीं उन्हें कुछ हो तो नहीं गया…?

वह अपने कमरे में खिड़की के पास खड़ी थी।

रात की हवा धीरे-धीरे पर्दों को हिला रही थी।

आसमान में बादलों के बीच आधा चाँद छिपता-निकलता दिखाई दे रहा था।

उसकी नजरें खाली आसमान पर टिकी थीं।

दिल में बस एक ही नाम गूंज रहा था।

“आप कहाँ हैं…?”

उसकी आँखें फिर भर आईं।

उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि वह इतनी बेचैन क्यों हो रही है।

जिस इंसान को वह ठीक से जानती भी नहीं…

उसकी गैरमौजूदगी उसे इस तरह क्यों तोड़ रही है।

उसी वक्त अचानक…

रात की खामोशी को चीरती हुई एक आवाज हवा में गूंजी।

टनन… टनन… टनन…

मंदिर की घंटी।

वह चौंक गई।

उसने खिड़की से बाहर झाँककर देखा।

दूर पहाड़ी पर बना महादेव का छोटा सा मंदिर चाँदनी में चमक रहा था।

हवा के साथ वहाँ से आती घंटियों की आवाज उसके कानों तक पहुँच रही थी।

कुछ पल के लिए वह बिल्कुल शांत खड़ी रही।

फिर उसके दिल में अचानक एक अजीब-सी भावना जागी।

जैसे कोई भीतर से उसे पुकार रहा हो।

उसने धीरे से फुसफुसाया—

“शायद… मुझे वहाँ जाना चाहिए…”

उसका दिल अब भी घबराया हुआ था।

लेकिन उसी घबराहट के बीच उसे एक हल्की-सी उम्मीद भी महसूस हो रही थी।

जैसे उस मंदिर में जाकर शायद उसके मन का यह बोझ हल्का हो सके।

उसने जल्दी से अपना दुपट्टा उठाया।

कमरे का दरवा

ज़ा खोला।

और बिना किसी को बताए बाहर निकल गई।

रात की सड़कें लगभग सुनसान थीं।

हवा में ठंडक घुली हुई थी।

वह तेज़ कदमों से मंदिर की तरफ बढ़ने लगी।

हर कदम के साथ मंदिर की घंटियों की आवाज और साफ सुनाई देने लगी।

जैसे कोई उसे अपने पास बुला रहा हो।

कल मिलते हैं अगले एपिसोड में, "दैत्य और अप्सरा" के साथ! तब तक के लिए शुभरात्रि!

Write a comment ...

Write a comment ...

Sirf Sadharan

Pro
जहाँ वास्तविकता खत्म होती है, वहीं से कल्पनाओं की दुनिया शुरू होती है… आपका स्वागत है।