
Chapter 25
पिछले एपिसोड में आपने पड़ा ,
मेघना चाची ने अप्सरा के माथे पर हाथ रखा। "बुखार तो नहीं है, पर चेहरा थोड़ा उतरा हुआ लग रहा है। ठीक है बेटा, तू आराम कर। मैं तेरे लिए अदरक वाली चाय और कुछ हल्का नाश्ता बनाकर लाती हूँ।"
माधुरी ने अपना बैग कंधे पर टांगते हुए अप्सरा को एक शक भरी नज़र से देखा। "अच्छा! कल रात तो अधिराज सर के साथ बड़े मज़े से नाच रही थी, तब तो थकावट नहीं थी? और आज अचानक तबीयत खराब हो गई?" उसने चिढ़ाते हुए कहा, पर अप्सरा की आँखों में छाई गहरी शांति देखकर वह चुप हो गई।
मेघना चाची और माधुरी के बाहर जाते ही कमरे में एक गहरी खामोशी छा गई, लेकिन यह खामोशी बोझिल नहीं थी। अप्सरा ने धीरे से अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और पीठ टिकाकर खड़ी हो गई। उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कुराहट खिल गई जो दिल की गहराइयों से आ रही थी।
उसने अपनी आँखें मूँद लीं और कल रात की एक-एक याद को फिर से जीने लगी। उसे याद आया कि कैसे वह बिस्तर पर लेटी अधिराज को याद कर रही थी और अचानक उसे अपनी कमर पर उन मज़बूत हाथों का स्पर्श महसूस हुआ था। वह स्पर्श डरावना नहीं था, बल्कि उसमें एक ऐसी सुरक्षा थी जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल था।
अब आगे.......
अप्सरा को रह-रहकर अधिराज की वह मखमली आवाज़ कानों में सुनाई दे रही थी— "पुकारा और हम चले आए..." वह धीरे से चलकर अपने आईने के सामने खड़ी हुई। उसने अपनी गर्दन को छुआ, जहाँ अब वह काला निशान नहीं था। अधिराज ने न सिर्फ उसकी त्वचा से वह निशान मिटाया था, बल्कि उसके मन के डर को भी खत्म कर दिया था।
अप्सरा बेड पर बैठ गई और उस पुरानी डायरी को सहलाने लगी। वह मुस्कुराते हुए खुद से कहने लगी, "क्या वाकई कोई मेरे लिए सदियों तक इंतज़ार कर सकता है? क्या मैं वाकई इतनी खुशकिस्मत हूँ?"
कल रात जब उसने अपना सिर अधिराज के चौड़े कंधे पर रखा था, तो उसे लगा था जैसे उसकी सारी थकान, सारा तनाव एक पल में गायब हो गया हो। वह एहसास इतना असली था कि आज सुबह जागने के बाद भी उसे अपने कमरे की हवा में अधिराज की वही बर्फीली और चन्दन जैसी खुशबू महसूस हो रही थी।
ये पल उसकी जिंदगी के सबसे सुकून देने वाले पल थे। एक ऐसी जिंदगी, जहाँ अब तक सिर्फ अकेलापन और डरावने सपने थे, वहाँ अब अधिराज एक ढाल बनकर खड़ा था।
अप्सरा ने डायरी को अपने सीने से लगा लिया और खिड़की से आती धूप को महसूस करने लगी। उसे अब किसी बात का डर नहीं था। उसे पता था कि वह जहाँ भी होगी, अधिराज का साया उसे ढूंढ ही लेगा। आज उसे कॉलेज न जाने का दुख नहीं था, बल्कि घर पर रहकर इन यादों को संजोने की खुशी थी।
एक तरफ अप्सरा अपने कमरे की शांति में अधिराज की यादों को समेट रही थी, वहीं दूसरी ओर शहर के बाहरी इलाके में स्थित एक पुराने और वीरान शिव मंदिर के खंडहरों में विक्रांत का क्रोध ज्वालामुखी की तरह फटने को तैयार था।
एक तरफ अप्सरा अपने कमरे की शांति में अधिराज की यादों को समेट रही थी, वहीं दूसरी ओर शहर के बाहरी इलाके में स्थित एक पुराने और वीरान शिव मंदिर के खंडहरों में विक्रांत का क्रोध ज्वालामुखी की तरह फटने को तैयार था।
क्यों महादेव आप तो सबके है देव दानव किसी में फर्क नहीं करते। तो ऐसा क्यों है बार बार वो दैत्यराज कैसे जीत जाता है। आप मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकते महादेव। मैं आपका सबसे बड़ा भक्त हूँ। उस अधिराज को मैंने ही आपकी भक्ति का मार्ग दिखाया था उसने रक्षक जाति को धोखा दिया है और उसने धोखा दिया मुझे देखा।
"तूने सोचा था कि तू उसे बचा लेगा? तूने उसका निशान मिटा दिया... पर तू उसकी किस्मत को मुझसे कैसे बचाएगा?" विक्रांत ने पागलों की तरह हंसते हुए आसमान की ओर देखा। उसकी हंसी में एक ऐसी कड़वाहट थी जो रूह कपा दे।
"अधिराज...!!!" विक्रांत की दहाड़ पूरे खंडहर में गूँज उठी। उसने गुस्से में पास पड़े एक पत्थर के खंभे पर ज़ोरदार वार किया। खंभा दरक गया, पर विक्रांत की नफरत और गहरी हो गई।
विक्रांत शिवलिंग के सामने गिर पड़ा, उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं और आँखों में गुस्से के साथ-साथ एक पुराना गहरा ज़ख्म भी झलक रहा था। उसने मुट्ठी में मंदिर की राख भींची और उसे हवा में उड़ाते हुए चीखा।
एक तरफ विक्रांत के मन में बदले की आग धधक रही थी, वहीं दूसरी तरफ अप्सरा के घर का माहौल आज एकदम शांत और सुखद था। खिड़की से आती धूप की सुनहरी किरणों ने जैसे उसके कमरे को नई ताजगी से भर दिया था।
उसने मन ही मन सोचा, "आज सब कुछ कितना बदला हुआ और सुंदर लग रहा है।"
तभी उसने रसोई से आती चाय की खुशबू महसूस की। वह गुनगुनाते हुए कमरे से बाहर निकली।
"चाची! आज मौसम कितना सुहाना है न?" अप्सरा ने चहकते हुए मेघना चाची के गले में हाथ डाल दिया।
मेघना चाची ने मुस्कुराकर उसे देखा। "अरे वाह! सुबह तो तू कह रही थी कि तबीयत ठीक नहीं है, और अब इतनी फुर्ती? क्या बात है, कोई लॉटरी लग गई है क्या?"
"नहीं चाची, बस मन बहुत हल्का लग रहा है," अप्सरा ने हंसते हुए कहा। "पता नहीं क्यों, पर आज मेरा बहुत मन है कि मैं पास वाले शिव मंदिर जाऊँ। काफी दिन हो गए महादेव के दर्शन किए। मैं सोच रही हूँ आज जाकर थोड़ा जलाभिषेक करूँ और शुक्रिया अदा करूँ।"
चाची ने उसके माथे को चूमा। "ये तो बहुत अच्छी बात है बेटा। महादेव का आशीर्वाद तो लेना ही चाहिए। जा, जल्दी से तैयार हो जा, मैं तेरे लिए फल और पूजा की थाली तैयार कर देती हूँ।"
अप्सरा झूमती हुई अपने कमरे में गई। उसने एक बहुत ही सादी पर सुंदर पीली कुर्ती पहनी और अपने बालों को खुला छोड़ दिया। जैसे ही उसने अलमारी से अपनी ओढ़नी निकाली, उसकी नज़र उस डायरी पर पड़ी जो अधिराज छोड़ गया था।
उसने डायरी को प्यार से सहलाया और मुस्कुराकर कहा, अधिराज
वह घर से बाहर निकली, तो उसे हवा के हर झोंके में वही चन्दन की महक महसूस हो रही थी। रास्ते में चलते हुए उसने खिलते हुए फूलों को देखा और पक्षियों की चहचहाहट सुनी। उसे ऐसा लग रहा था जैसे आज वह सालों बाद पहली बार खुलकर साँस ले रही है।
वह खुश थी, बेफिक्र थी और उसके दिल में सिर्फ एक ही नाम गूँज रहा था अधिराज।
दोस्तों, प्यार का यह सुकून कितना गहरा है! अप्सरा की जिंदगी में पहली बार इतनी शांति आई है। पर क्या यह शांति तूफान के आने से पहले की खामोशी है? अधिराज ने उसे घर पर रहने को क्यों कहा था?
कैसा लगा आपको अप्सरा का यह प्यारा और सुकून भरा अंदाज? कमेंट्स में अपनी राय ज़रूर दें!
कल मिलते हैं अगले एपिसोड में, "दैत्य और अप्सरा" की एक नई शुरुआत के साथ! तब तक के लिए शुभरात्रि!


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