
Chapter 24
पिछले एपिसोड में आपने पड़ा ,
अप्सरा ने उस लॉकेट को अपने सीने से लगा लिया। उसे महसूस हुआ जैसे अधिराज खुद उसके पास खड़ा है।
अप्सरा अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी, पर उसकी आँखों से नींद कोसों दूर थी। कमरे में मद्धम सी रोशनी थी और बाहर हवा के झोंके खिड़की के पर्दों को धीरे-धीरे हिला रहे थे। उसने उस लॉकेट को अपनी मुट्ठी में कसकर भींचा हुआ था
अप्सरा अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी, पर उसकी आँखों से नींद कोसों दूर थी। कमरे में मद्धम सी रोशनी थी और बाहर हवा के झोंके खिड़की के पर्दों को धीरे-धीरे हिला रहे थे। उसने उस लॉकेट को अपनी मुट्ठी में कसकर भींचा हुआ था
अप्सरा अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी, पर उसकी आँखों से नींद कोसों दूर थी। कमरे में मद्धम सी रोशनी थी और बाहर हवा के झोंके खिड़की के पर्दों को धीरे-धीरे हिला रहे थे। उसने उस लॉकेट को अपनी मुट्ठी में कसकर भींचा हुआ था जबसे उसे अपनी और अधिराज का सच पता चला है उसे अधिराज की याद आ रही थी।
वह बार-बार करवट बदल रही थी। जब भी वह आँखें मूँदती, उसे अधिराज का वह चेहरा याद आता जब उसने उसकी गर्दन पर अपने होंठ रखे थे।
अब आगे.......
अप्सरा ने छत की ओर देखते हुए एक गहरी साँस ली और मन ही मन बुदबुदाया, "क्या यह सब सच है? या मैं कोई हसीन ख्वाब देख रही हूँ? काश... काश आप इस वक्त यहाँ होते अधिराज। मुझे बहुत याद आ रही है आपकी।
जैसे ही उसके मन ने अधिराज को पुकारा, कमरे की हवा अचानक भारी और ठंडी हो गई। मोमबत्ती की लौ एक पल के लिए काँपी और स्थिर हो गई।
अप्सरा अभी लेटी ही हुई थी कि अचानक उसे अपनी कमर पर किसी के मज़बूत और ठंडे हाथों का स्पर्श महसूस हुआ। वह स्पर्श इतना जाना-पहचाना था कि अप्सरा के शरीर के रोंगटे खड़े हो गए। वह डर से नहीं, बल्कि एक अजीब से सुखद अहसास से जम गई।
अधिराज उसके ठीक पीछे बिस्तर पर लेटा हुआ था। उसने अपनी एक बांह अप्सरा की कमर पर लपेट दी और उसे अपनी ओर खींच लिया। अप्सरा की पीठ अब अधिराज के चौड़े और मज़बूत सीने से टिकी हुई थी।
"पुकारा और हम चले आए..." अधिराज की वह गूँजती हुई मखमली आवाज़ उसके कान के बिल्कुल पास सुनाई दी। "तुम्हारी हर धड़कन मेरे दिल तक पहुँचती है अप्सरा। तुम्हें क्या लगा, मैं तुम्हें अकेला छोड़ दूँगा?"
अप्सरा ने कांपते हाथों से उसकी बांह को छुआ। वह हकीकत था। उसके शरीर की वह बर्फीली खुशबू पूरे कमरे में फैल गई थी। अप्सरा धीरे से मुड़ी और उसकी आँखों में झाँका। अंधेरे में भी अधिराज की आँखें किसी अनमोल रत्न की तरह चमक रही थीं।
"आप... आप यहाँ कैसे? दरवाज़ा तो बंद था," अप्सरा ने लगभग फुसफुसाते हुए पूछा।
अधिराज के होंठों पर एक मदहोश कर देने वाली मुस्कान आई। उसने अप्सरा के माथे से एक लट हटाई और कहा, "मेरे लिए कोई भी दरवाज़ा बंद नहीं है, खासकर तब जब तुम्हारी रूह मुझे बुला रही हो। तुमने याद किया... और मैं अपनी दुनिया छोड़कर तुम्हारी बाहों में खिंचा चला आया।"
उसने अप्सरा के चेहरे को बहुत कोमलता से थाम लिया। उसके अंगूठे ने अप्सरा के होंठों को छुआ, जिससे अप्सरा की साँसें तेज़ हो गईं। कमरे का वातावरण अब इतना रूमानी हो गया था कि समय जैसे पूरी तरह रुक गया था।
"आज रात," अधिराज ने धीमी आवाज़ में कहा, "सिर्फ तुम हो और मैं हूँ। दुनिया का कोई नियम, कोई भय हमें यहाँ नहीं ढूंढ सकता।"
सो जाओ तुम बोहोत थक गई हो। मैं हूँ यहाँ तुम्हारे पास हकीकत में।
अधिराज की उन बातों में एक ऐसा सुकून था जिसे अप्सरा ने पहले कभी महसूस नहीं किया था। उसकी मखमली आवाज़ किसी लोरी की तरह उसके कानों में घुल रही थी। अप्सरा ने धीरे से अपना सिर अधिराज के मज़बूत कंधे पर टिका दिया। उसके शरीर की वह ठंडी खुशबू अब उसे डरा नहीं रही थी, बल्कि एक सुरक्षा का अहसास दे रही थी।
अधिराज ने बहुत कोमलता से अप्सरा के सिर पर अपना हाथ रखा और उसकी जुल्फों को सहलाने लगा। उसकी उंगलियों का स्पर्श इतना जादुई था कि अप्सरा की भारी होती पलकें अब बंद होने लगी थीं। कमरे में मोमबत्ती की लौ अब मद्धम हो चुकी थी, और खिड़की से आती चाँदनी उन दोनों के चेहरों पर एक रूहानी चमक बिखेर रही थी।
"मैं सो रही हूँ..." अप्सरा ने अधखुली आँखों से बुदबुदाया, "पर वादा कीजिए कि जब मैं सुबह जागूँगी, तो आप यहीं होंगे। यह कोई सपना तो नहीं न?"
अधिराज ने झुककर अप्सरा के कान के पास धीरे से कहा, "सपना होता तो यह धड़कनें इतनी तेज़ न होतीं। सो जाओ मेरी अप्सरा, तुम्हारी सुबह मेरी मुस्कान से शुरू होगी।"
अप्सरा के चेहरे पर एक मासूम सी मुस्कान खिंच गई। उसने अधिराज की बांह को और कसकर पकड़ लिया और गहरी नींद के आगोश में समा गई।
जब अप्सरा पूरी तरह सो गई, तो अधिराज का चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा। उसकी आँखों में वह गहरी लाल चमक वापस लौट आई जो उसकी असली शक्ति की प्रतीक थी। उसने अपनी नज़र खिड़की की ओर घुमाई। कमरे के बाहर, अंधेरे सायों के बीच विक्रांत अभी भी घात लगाए बैठा था, लेकिन कमरे की दीवारों के चारों ओर अधिराज ने एक अदृश्य 'ऊर्जा का घेरा' बना दिया था जिसे पार करना किसी भी काली शक्ति के लिए नामुमकिन था।
अधिराज ने सोते हुए अप्सरा के माथे को चूमा और बेहद धीमी आवाज़ में कहा, कितनी सदियों से इन पलो के लिए हम दोनों एक दूसरे से अलग रहे है। लेकिन अब नहीं मैं तुम्हे कभी खुद से अलग नहीं होने दूंगा। नहीं छोडूंगा उनको जिनके कारण तुम्हें सदियों तक भटकना पड़ा और मुझे एक पत्थर की मूर्ति बनाकर छोड़ दिया था। ये सब कहते हुए उसकी आँखों से जैसे आग निकल रही थी।
अधिराज की आँखों में दहकती वह लाल अग्नि कमरे की ठंडक को सोख रही थी। उसकी मुट्ठी इतनी ज़ोर से भिंची कि उसके पोरों से वही काली धुंध निकलने लगी, जो उसके चरम क्रोध का संकेत थी। उसने सोते हुए अप्सरा के मासूम चेहरे की ओर देखा, जो इस बात से पूरी तरह अनजान थी कि उसके पास बैठा यह शख्स दुनिया के लिए काल है, पर उसके लिए एक ढाल।
सूरज की सुनहरी किरणें खिड़की के पर्दों को चीरती हुई अप्सरा के चेहरे पर पड़ीं। अप्सरा ने अंगड़ाई ली और अपनी आँखें खोलीं। उसे रात की वह बातें धुंधली सी याद आ रही थीं, जैसे किसी ने उसके कान में सदियों पुराने राज़ कहे हों।
वह उठी और उसने देखा कि उसके बिस्तर के पास मेज़ पर एक पुरानी चमड़े की डायरी रखी है, जैसे ही उसने डायरी उठाई, जिस पर सोने के अक्षरों में कुछ लिखा है। आज घर ही रहना है तुम्हें। अप्सरा मुस्कुराने लगी। आज तो चैन की नींद आई मुझे।
तभी कमरे के बाहर से उसकी सहेली माधुरी की चिल्लाने की आवाज़ आई। "अप्सरा! जल्दी बाहर आ!और कितना सोयेगी। तभी अप्सरा ने समय देखा तो 8 बज चुके थे।
अप्सरा ने बहार जाकर माधुरी को कहा कि मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही है। आज तू ही चली जा मेघना ने जैसे ही सुना उसके कान खड़े हो गए मेघना तुरंत आई अप्सरा के पास उसके चेक करने लगी क्या हुआ है मेरी बेटी को दिखाओ तो जरा। डॉक्टर के चलते है बेटा तभी अप्सरा ने मेघा को मना करते हुए कहा। चाची थकावट है बस आराम करुँगी तो ठीक हो जाउंगी।
मेघना चाची ने अप्सरा के माथे पर हाथ रखा। "बुखार तो नहीं है, पर चेहरा थोड़ा उतरा हुआ लग रहा है। ठीक है बेटा, तू आराम कर। मैं तेरे लिए अदरक वाली चाय और कुछ हल्का नाश्ता बनाकर लाती हूँ।"
माधुरी ने अपना बैग कंधे पर टांगते हुए अप्सरा को एक शक भरी नज़र से देखा। "अच्छा! कल रात तो अधिराज सर के साथ बड़े मज़े से नाच रही थी, तब तो थकावट नहीं थी? और आज अचानक तबीयत खराब हो गई?" उसने चिढ़ाते हुए कहा, पर अप्सरा की आँखों में छाई गहरी शांति देखकर वह चुप हो गई।
मेघना चाची और माधुरी के बाहर जाते ही कमरे में एक गहरी खामोशी छा गई, लेकिन यह खामोशी बोझिल नहीं थी। अप्सरा ने धीरे से अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और पीठ टिकाकर खड़ी हो गई। उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कुराहट खिल गई जो दिल की गहराइयों से आ रही थी।
उसने अपनी आँखें मूँद लीं और कल रात की एक-एक याद को फिर से जीने लगी। उसे याद आया कि कैसे वह बिस्तर पर लेटी अधिराज को याद कर रही थी और अचानक उसे अपनी कमर पर उन मज़बूत हाथों का स्पर्श महसूस हुआ था। वह स्पर्श डरावना नहीं था, बल्कि उसमें एक ऐसी सुरक्षा थी जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल था।
मिलते हैं कल, एक नए और रोमांचक एपिसोड में!


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