18

विरासत का भार

                 Chapter 18

पिछले एपिसोड में आपने पड़ा ,

वह मोती अप्सरा के हाथ से कुछ इंच ऊपर हवा में स्थिर था। वह न तो गर्म था, न ही उससे कोई आवाज़ आ रही थी, बस एक दिव्य चमक के साथ धड़क रहा था। अप्सरा की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह कोई भ्रम है या उसकी आँखों का धोखा। जैसे ही उसने डरते हुए अपनी उंगली उस चमकते मोती के करीब ले जाई, वह मोती अचानक पिघलकर उसकी त्वचा के अंदर समा गया।

"यह... यह क्या था?" वह बुरी तरह हांफने लगी।

उस प्रकाश के गायब होते ही कमरे की गर्मी भी खत्म हो गई और सब कुछ पहले जैसा सामान्य हो गया। अप्सरा ने पागलों की तरह अपनी हथेलियों को रगड़ा, उन्हें उलट-पलट कर देखा, पर वहाँ कोई निशान नहीं था। उसे ऐसा लगा जैसे वह पागल हो रही है। वह पसीने से तर-बतर बिस्तर पर वापस बैठ गई।

उसकी बुद्धि काम नहीं कर रही थी। उसे लगा कि शायद यह उसकी थकान या किसी बीमारी का असर है। वह इस बात से बिल्कुल अनजान थी कि उसके भीतर एक ऐसी शक्ति ने दस्तक दी है जो उस महल की काली परछाइयों का काल बनने वाली है। उसने तय किया कि वह इस बारे में किसी को नहीं बताएगी, वरना लोग उसे पागल समझेंगे।

अब आगे.......

गलियारे में भारी कदमों की गूँज रुकी और एक ऐसा शख्स क्लास के अंदर दाखिल हुआ जिसे अब तक सबने सिर्फ 'फोर्ब्स' की मैगज़ीन या इंटरनेशनल न्यूज़ चैनल्स पर देखा था। उसके कदम रखते ही क्लास की हवा का रुख पूरी तरह बदल गया। प्रोफेसर खन्ना की वह पुरानी, बोरियत भरी क्लास अब किसी हाई-प्रोफाइल बोर्डरूम जैसी लग रही थी।

देविका, जो हमेशा बेपरवाह रहती थी, आज अपनी सीट पर एकदम सीधी बैठी थी। उसकी आँखों में वह पुरानी बगावत नहीं थी, बल्कि एक गहरा आदर था। उसने अपनी नज़रें उस शख्स से एक पल के लिए भी नहीं हटाईं। क्यूंकि वो जानती थी ये शख्स कौन है।

वह शख्स जैसे ही ब्लैकबोर्ड के पास खड़ा हुआ, पूरी क्लास में एक सन्नाटा छा गया—पर यह सन्नाटा डर का नहीं, बल्कि एक अकल्पनीय आकर्षण और सम्मान का था। वहाँ मौजूद हर छात्र, चाहे वह लड़का हो या लड़की, अपनी पलकें झपाना भूल गया था। वह दुनिया का सबसे कम उम्र का और सबसे ताकतवर बिजनेस टाइकून था—जिसकी एक मुस्कान शेयर मार्केट को हिला सकती थी और जिसका गुस्सा देशों की तकदीर बदल सकता था। उसकी शख्सियत में एक ऐसा खिंचाव था कि सबका मन कर रहा था बस उसे देखते ही रहें।

देविका, जो हमेशा बेपरवाह और विद्रोही रहती थी, आज अपनी सीट पर एकदम सीधी और शालीन बैठी थी। उसकी आँखों में वह पुरानी बगावत नहीं थी, बल्कि एक गहरा आदर और एक छिपा हुआ गर्व था। उसने अपनी नज़रें उस शख्स से एक पल के लिए भी नहीं हटाईं, क्योंकि वह जानती थी कि यह शख्स कौन है और उसका उससे क्या रिश्ता है।

"गुड मॉर्निंग," उस शख्स ने कहा। उसकी आवाज़ में एक ऐसी खनक, अधिकार और गहराई थी जैसे कोई मधुर लेकिन शक्तिशाली संगीत बज रहा हो। क्लास के सभी छात्र, जो अपनी सुध-बुध खो चुके थे, एक सुर में मंत्रमुग्ध होकर बोले, "गुड मॉर्निंग, सर।"

अप्सरा ने जैसे ही वह आवाज़ सुनी, उसने सामने की तरफ देखा और उस शख्स को देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह चौंक गई। यह वही शख्स है जिसे वह न जाने कितने ही दिनों से अपने ख़वाबों में देख रही है। उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। कॉलेज की उस पार्टी में भी जब उसने इस शख्स को दूर से देखा था, तो उसे लगा था कि वह उसका वहम है... लेकिन आज यह शख्स, यह Global Business Icon, खुद उसके सामने खड़ा है।

"क्या यह वाकई सच है?" अप्सरा का मन चीख-चीख कर यह सवाल पूछ रहा था।

तभी देविका ने अप्सरा का हाथ धीरे से पकड़ा और उसकी तरफ झुककर फुसफुसाते हुए कहा, "जरा क्लास के बाकी स्टूडेंट्स को तो देखो..."

जैसे ही अप्सरा ने गौर किया, उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ। क्लास की लड़कियां ही नहीं, बल्कि सबसे शरारती और घमंडी लड़के भी उसे ऐसे देख रहे थे जैसे वह कोई साक्षात् देवता हो। उसकी काली, गहरी आँखें जब पूरी क्लास पर घूमती थीं, तो हर एक छात्र को यही लग रहा था कि वह सिर्फ और सिर्फ उसे ही देख रहा है।

अप्सरा का दिल अब इतनी तेज़ी से धड़क रहा था कि उसे अपनी धड़कनें कानों में सुनाई दे रही थीं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे यह शख्स डरा रहा है या अपनी जादुई कशिश से अपनी तरफ खींच रहा है। तभी देविका ने फिर से अप्सरा की तरफ गर्दन झुकाई। पर इस बार देविका के चेहरे पर कोई खौफ नहीं था, बल्कि एक अजीब सी जीत की खुशी और वह शाही गर्व था जो सिर्फ किसी 'सोलंकी' के चेहरे पर हो सकता था।

अधिराज ने अपनी कलाई पर बंधी बेशकीमती घड़ी की ओर देखा और फिर एक मद्धम मुस्कान के साथ क्लास की ओर मुड़ा। उसका हर अंदाज़ ऐसा था जैसे वह कोई साधारण इंसान नहीं, बल्कि इस पूरी दुनिया का स्वामी हो। उसने अपना हाथ पोडियम पर रखा और गहरी आवाज़ में बोलना शुरू किया।

"शायद आप में से बहुत कम लोग यह जानते होंगे कि मैं आज यहाँ क्यों हूँ," अधिराज की आवाज़ पूरी क्लास में गूंजी। "आज से ठीक 30 साल पहले तक, मेरे पिता—श्री पृथ्वीराज सिंह सोलंकी, इसी जगह, इसी हॉल में खड़े होकर लेक्चर दिया करते थे। वे न केवल अपने समय के एक जाने-माने और दिग्गज बिजनेसमैन थे, बल्कि एक ऐसे इंसान थे जो मानते थे कि असली दौलत तिजोरियों में नहीं, बल्कि देश के भविष्य में होती है।"

पूरी क्लास मंत्रमुग्ध होकर सुन रही थी। अधिराज की आँखों में अपने पिता के लिए एक गहरा सम्मान था, लेकिन उसमें एक ऐसी चमक भी थी जो केवल सोलंकी खानदान के खून में ही हो सकती थी।

"मेरे पिता का बिज़नेस साम्राज्य तब भी पूरी दुनिया में फैला हुआ था, और वे बेहद व्यस्त रहते थे। लेकिन इसके बावजूद, वे हर हफ्ते समय निकालकर यहाँ अपने देश के छात्रों के बीच आते थे। वे अपने जीवन के व्यावसायिक अनुभवों (Business Experiences) को साझा करते थे ताकि हमारे देश का भविष्य सही हाथों में हो और आप जैसे छात्रों को वह पूरा सपोर्ट मिल सके जिसकी उन्हें ज़रूरत है।"

अधिराज एक पल के लिए रुका और उसकी नज़रें फिर से अप्सरा पर जाकर ठहरीं। अप्सरा को महसूस हुआ जैसे अधिराज के शब्द उसके रूह के अंदर तक उतर रहे हों।

"आज, मैं भी यहाँ अपने पिता की उसी परंपरा और इच्छा को आगे बढ़ाने आया हूँ। सोलंकी ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज केवल मुनाफ़ा कमाना नहीं जानता, बल्कि यह भी जानता है कि सही टैलेंट को कब और कैसे पहचानना है। मैं यहाँ आप लोगों को बिज़नेस नहीं सिखाने आया, बल्कि यह बताने आया हूँ कि जब मंज़िल बड़ी हो, तो रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं।"

कैसा लगा आज का यह एपिसोड? अपनी राय कमेंट्स में ज़रूर बताएं,

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Sirf Sadharan

Pro
जहाँ वास्तविकता खत्म होती है, वहीं से कल्पनाओं की दुनिया शुरू होती है… आपका स्वागत है।