
एपिसोड - 4
पिछले एपिसोड में आपने पड़ा ,
अभिनव का शरीर झटका खाकर ऊपर उठा,
और अचानक उसके सीने पर नीला प्रकाश समा गया।
नैना चीख पड़ी।
मीनल के हाथ काँपने लगे।
अभिनव की पलकें धीरे-धीरे खुलीं…
लेकिन अब उसकी आँखों में इंसानी चमक नहीं थी।
वह किसी और जगह देख रहा था…
किसी और दुनिया… किसी दूसरे अंधेरे में—
जहाँ गणिका का हाथ अंधेरे में किसी को खोज रहा था।
और उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“मैं आ रहा हूँ…”
अब आगे ,
15 साल बीत जाने के बाद भी,
न तो गणिका ने अभिनव को देखा था,
और न ही अभिनव ने दुनिया को अपना चेहरा दिखाया था।
15 साल बाद

गणिका दुनिया के लिए एक सामान्य लड़की
दुनिया को वह बिलकुल सामान्य दिखती थी
लंबे खुले बाल, हल्की-सी मुस्कान,
कहीं से भी नहीं लगता कि उसके भीतर
कुंड की शक्तियाँ बह रही हैं।
• वह कॉलेज जाती है
• दोस्तों के साथ हँसती-बतियाती है
• नोट्स बनाती है
• और परीक्षा के लिए तैयारी भी करती है
पर उसके पास एक राज़ है
वह साधना में सिद्ध है।
आत्माओं की भाषा सुन सकती है।
और किसी भी इंसान की असलियत
उसकी आँखों से छिप नहीं सकती।
फिर भी उसने यह सब किसी को नहीं बताया।
वह चाहती है कि दुनिया उसे एक “normal girl” समझे।
जो कॉलेज आती है, क्लास करती है, और घर लौटती है।
लेकिन उसकी समस्या यह थी—
कभी-कभी भीड़ में कोई अजनबी खड़ा होता…
और गणिका को उसका धड़कता हुआ अतीत सुनाई देता था।
ऐसा कोई नहीं था
जिससे वह सचमुच जुड़ी महसूस करे।
सिवाय उस अनजानी आवाज़ के
जो सालों से उसके दिल में छुपी थी।
दूसरी तरफ था अभिनव—
28 साल की उम्र में
लंदन का सबसे तेज़ी से उभरता हुआ Young Tycoon।
दुनिया में उसका नाम था,
उसकी कंपनियाँ थीं,
उसका साम्राज्य था—
पर उसका चेहरा…
कभी किसी ने नहीं देखा।
न मीडिया,
न पार्टनर,
न क्लाइंट,
न ही दुनिया।
बस एक आवाज़,
एक परछाई,
एक नाम
अभिनव भसीन।
कहते हैं वह कभी कैमरे के सामने नहीं आता।
हर मीटिंग उसके पीछे काँच की दीवार,
या आवाज़–कॉल पर होती है।
लोग कहते हैं वह रहस्यमय है,
कहते हैं कि उसने अपना चेहरा छुपा रखा है क्योंकि—
उसकी आँखों में कुछ “साधारण” नहीं है।
लोगों को नहीं पता,
लेकिन उसकी आँखों में वही नीली चमक है
जो गणिका की आँखों में जागी थी।
और उसे भी उसकी तरह
लोगों की “ऊर्जा” महसूस होती है—
हँसी के पीछे छुपा झूठ,
चेहरे के पीछे छुपी मंशा,
और हाथ मिलाते ही पीछे का सच।
इसलिए उसने
किसी को पास आने देना वर्षों पहले बंद कर दिया था।
लेकिन…
कभी-कभी
ठंडी हवा में एक नाम फुसफुसाता—
“गणिका…”
और उसके सीने में वही खिंचाव महसूस होता
जो उसे किसी अदृश्य दिशा में खींच रहा था।
एक-दूसरे से अनजान। अभी तक किसी को नहीं पता कि ये दो लोग,
दोनों अलग दुनियाओं में रहते हुए भी
किसी अदृश्य शक्ति से बंधे हुए हैं।
• गणिका सोचती थी—
“कौन है वो आवाज़?
जो मुझे बचपन से बुलाती है?”
• और अभिनव सोचता था—
“कौन है वो लड़की?
जो मेरी रातों में आकर मेरी सांसें रोक देती है?”
दोनों अपनी-अपनी दुनिया में बढ़ रहे हैं—
मजबूत, खतरनाक, सफल,
लेकिन एक-दूसरे की ओर खिंचते हुए।
सालों बीत चुके थे,
पर आज भी गणिका कभी–कभी अचानक रुक जाती थी।
कॉलेज की भीड़ में,
कैंपस के गेट पर,
या बस किसी लाइब्रेरी के कोने में—
उसका दिल अजीब-सी धड़कन महसूस करता था।
मानो कोई उसे दूर से देख रहा हो।
जैसे कोई अदृश्य हवा उसके पास से गुजर जाए
और उसके कानों में एक पुरानी फुसफुसाहट छोड़ जाए—
“मैं यहाँ हूँ…”
पर गणिका हर बार उस एहसास को झटक देती।
वह अपने आप से कहती—
“यह सिर्फ मेरी साधना की वजह से है… भ्रम है।”
लेकिन उसके भीतर वो छोटी बच्ची—
जो कुंड में डूब रही थी,
और जिसने किसी अनजान आवाज़ को पुकारा था—
आज भी ज़िंदा थी।
उसे लगता था कि दुनिया में कहीं कोई है
जो उसी की धड़कन पर धड़कता है।
पर कौन…
यह वह खुद नहीं जानती थी।
हर सफलता के पीछे एक खालीपन**
अभिनव की ज़िंदगी पूरी तरह बदल चुकी थी।
वह मीटिंग्स, कॉन्ट्रैक्ट्स और बिज़नेस डील्स के बीच चलता था,
पर भीतर से अभी भी वैसा ही अकेला था
जैसा 12 साल की उम्र में था।
उसके आसपास दुनिया की हर सुविधा थी—
पर उसकी आत्मा सिर्फ एक ही आवाज़ के साथ जुड़ी थी।
वह आवाज़ कुछ समय शांत रहती,
फिर अचानक उसकी नींद तोड़ देती—
“अभि…”
वह अक्सर इसे अपने मन का खेल मानने की कोशिश करता था,
पर उसकी आँखों में उभरने वाली नीली चमक
हर बार उसे सच का एहसास करा देती—
कि वह लड़की…
जिसे वह कभी मिला ही नहीं…
उसे उसकी ज़रूरत है।
इसलिए उसने अपनी पहचान छुपा ली।
दुनिया से चेहरा छुपाना आसान था,
पर उस अदृश्य बंधन से खुद को छुपाना असंभव।
कभी-कभी
रात की काली खिड़की पर
हल्के से उसकी सांसों का धुँधलापन
एक चेहरा बना देता—
एक लड़की की परछाई।
वह परछाई उसे देखती भी नहीं थी।
बस… उसे पुकारती
गणिका कॉलेज से घर लौट रही थी।
सूरज ढल चुका था
और कैंपस में हल्की हवा बह रही थी।
जैसे ही उसने गेट से बाहर कदम रखा—
उसकी साँस अचानक अटक गई।
उसका पूरा शरीर एक पल के लिए ठहर गया।
उसकी आँखों के सामने
दुनिया धीमी हो गई।
आवाज़ें धुंधली पड़ गईं।
हवा भारी हो गई।
और उसके कानों में एक गहरी आवाज़ आई—
“गणिका?”
वह पलटकर देखने लगी।
आसपास कोई नहीं था।
बस कुछ स्टूडेंट्स, कुछ गाड़ियाँ, कुछ बातें।
पर उसके अंदर
एक कंपन उठ चुका था—
जैसे उसका नाम
किसी ने इतने प्यार,
इतनी बेचैनी,
इतनी वर्षों की प्रतीक्षा के साथ पुकारा हो
कि वह आवाज़ दिल में उतर गई।
उसने दिल पर हाथ रखकर साँस ली।
आँखें बंद कीं।
और उसी क्षण—
हवा में नीली चिंगारी चमकी।
गणिका का दिल जोर से धड़का।
“यह वही एहसास है…
जो बचपन में हुआ था।”
उसी समय…
लंदन में—
अभिनव, जो एक भारी बिज़नेस मीटिंग के बीच था,
अचानक अपना pen गिरा बैठा।
उसके सीने में दर्द उठा…
और उसने मेज़ पकड़ ली।
सामने बैठे लोग चौंक गए।
“Sir, are you okay?”
लेकिन अभिनव सुन ही नहीं पा रहा था।
क्योंकि उसके मन में
वही आवाज़ उभरी—
वही लड़की की आवाज़…
जो वर्षों से उसे पुकार रही थी।
उसकी आँखों में नीली चमक फैल गई।
उसकी सांसें तेज़ हो गईं।
और पहली बार—
उसने महसूस किया कि इस बार यह भ्रम नहीं है।
यह सच्चाई है।
बिना मिले… बिना देखे…
पहली बार इतनी ज़ोर से।**
अभी दोनों अनजान हैं।
दोनों अलग दुनिया में।
दोनों अलग ज़िंदगी में।
पर अब…
किस्मत उन्हें छुपा नहीं सकती।
अंधेरा उन्हें रोक नहीं सकता।
और समय उन्हें अलग नहीं रख सकता।
उनकी आत्माएँ
एक-दूसरे की ओर बढ़ चुकी हैं।
“स्वामी गणेश्वर भसीन की पुकार”
अभिनव अपने दादा के बुलावे पर आज दिल्ली एयरपोर्ट पर उतर चुका था।
फ्लाइट की खिड़की से बाहर देखते हुए उसका मन बेचैन था…
क्योंकि जितना वह अपने दादा के बारे में जानता था,
उससे कहीं ज़्यादा वह नहीं जानता था।
स्वामी गणेश्वर भसीन—
दुनिया से कटे हुए,
एकांत में जीने वाले,
और वर्षों से परिवार से दूर रहने वाले व्यक्ति।
जब उसकी दादी गुज़र गई थीं,
तो दादा ने सारी सांसारिक चीज़ों को त्याग दिया था।
बड़ा घर, बिज़नेस, पार्टनर, दुनिया…
सब कुछ छोड़कर उन्होंने सन्न्यास ले लिया था।
और वही दिन था—
जिस दिन दादा ने परिवार से दूरी बना ली।
किसी की शादी में नहीं आए,
किसी त्योहार में नहीं,
किसी बीमारी, किसी संकट—कभी, कहीं नहीं।
यहाँ तक कि—
अभिनव ने भी अपने दादा को कभी नहीं देखा था।
उसके मन में हमेशा कई सवाल रहे—
“कैसे होते होंगे दादाजी?”
“किस वजह से उन्होंने घर छोड़ा?”
“बिना पीछे मुड़े इतने साल कैसे बिताए?”
पर इन सवालों का जवाब
कभी किसी ने नहीं दिया।
क्योंकि जवाब… किसी के पास था ही नहीं।
दुनिया में बहुत कम लोग जानते थे कि—
स्वामी गणेश्वर भसीन,
असल में एक ऐसे खानदान से थे
जो दुनिया के सबसे बड़े और शक्तिशाली
बिज़नेस परिवारों में से एक माना जाता था।
तो फिर…
आखिर ऐसा क्या हुआ था,
जिसने उन्हें सब कुछ छोड़कर सन्यास लेने पर मजबूर कर दिया?
और उससे भी बड़ा सवाल—
इतने सालों बाद आज…
उन्होंने अचानक अभिनव को ही क्यों बुलाया?
ना उसकी मां को,
ना पिताजी को,
ना किसी रिश्तेदार को—
सीधे और सिर्फ अभिनव को।
एयरपोर्ट के गेट पर चलते हुए
अभिनव के मन में यही सब चल रहा था।
जैसे उसका दिमाग सवालों का तूफान बन चुका हो।
“दादाजी से मिलने पर क्या होगा?”
“कहीं वो सच… वही न हो जिससे मैं हमेशा डरता रहा?”
“कहीं ये बुलावा… किसी मुसीबत का संकेत तो नहीं?”
उसने गहरी सांस ली।
शायद ज़िंदगी का सबसे बड़ा जवाब
उसे आज मिलने वाला था।
उसी सोच में डूबा अभिनव
एयरपोर्ट के बाहर आया।
एराइवल गेट पार होते ही
हवा में हल्की ठंडक ने उसका स्वागत किया।
एक काली SUV उसका इंतज़ार कर रही थी।
ड्राइवर ने झुककर कहा—
“Sir, हम मनाली चलेंगे।
Swamiji वहीं आपका इंतज़ार कर रहे हैं।”
अभिनव की आँखों में सन्नाटा उतर गया।
**मनाली…?
इतनी दूर?
दादा इतनी दूर क्यों हैं?
वहीं क्यों?”**
पर आवाज़ें मन में जितनी भी हों—
वह जानता था कि वापस मुड़ने का विकल्प नहीं है।
दादाजी बुला रहे थे।
सालों बाद…
पहली बार।
और वह कार की ओर बढ़ गया।
मनाली की ओर जाने वाली सड़कें
शाम के धुँधलके में डूबती जा रही थीं।
पहाड़ों की ठंडी हवा,
धीरे-धीरे गहराता कोहरा,
और चुपचाप रास्तों पर दौड़ती गाड़ियाँ…
मानो पूरी प्रकृति
किसी बड़ी कहानी का स्वागत कर रही हो।
अभिनव की यात्रा मनाली की ओर
काले SUV की पिछली सीट पर बैठा अभिनव
खामोशी में डूबा हुआ था।
कार की खिड़की के बाहर
पहाड़ों का विस्तार खुल रहा था।
लेकिन उसके मन में
सिर्फ एक ही बात गूंज रही थी—
“दादाजी… इतने वर्षों बाद…
सिर्फ मुझे क्यों बुलाया?”
ड्राइवर के शब्द उसके कानों में बार-बार गूंज रहे थे—
“Swamiji ने साफ कहा है कि आपको आज ही पहुँचना है, Sir.”
कितना अजीब था यह—
दादा, जिन्हें उसने कभी देखा नहीं…
जिनकी छाया तक परिवार को महसूस नहीं हुई…
आज वही स्वामी गणेश्वर भसीन
अभिनव को अकेले मनाली बुला रहे थे।
कार पहाड़ों पर चढ़ रही थी
और हवा में एक अनजाना डर घुल रहा था।
अभिनव ने अचानक सीने पर हाथ रखा—
एक पल के लिए
उसे वही पुरानी धड़कन महसूस हुई…
वही नीली ऊर्जा…
जो किसी एक लड़की से जुड़ी थी।
उसने धीमे से कहा—
“क्या ये सब…
उससे जुड़ा है?”
उसे पता नहीं था—
समय उसकी ओर तेज़ी से बढ़ रहा है।
या कहें…
वो लड़की उसकी तरफ खिंच रही है।
दूसरी तरफ गणिका लौट रही थी काशी से
तीन हफ्तों की काशी यात्रा।
तीन हफ्ते मंदिरों की घंटियों,
साधकों की ऊर्जा,
और घाटों पर बिछे आत्मिक कंपन में बिताए—
गणिका को लगा था कि
काशी की पवित्रता
उसके भीतर की बेचैनी को शांत कर देगी।
लेकिन…
वह जब काशी से मनाली की ओर चली,
बस की खिड़की से बाहर देखते हुए
उसे बार-बार वही अनुभूति होने लगी—
जैसे कोई
दूर पहाड़ों में
उसी का इंतजार कर रहा हो।
जैसे कोई
कई सालों से
उसे अपनी तरफ खींच रहा हो।
उसकी नजरें खिड़की पर टिक गईं।
घाटियाँ, जंगल, धुंध…
सब उसके सामने बह रहे थे।
और उसके भीतर कहीं
हल्की नीली रौशनी जगमगाई।
उसने धीरे से फुसफुसाया—
“मनाली…
मैं आ रही हूँ।”
काशी की घाटियों और मंत्रों के बीच
उसने एक बात महसूस की थी—
कि उसकी यात्रा अभी शुरू हुई है।
वो जहां तक पहुंची थी,
वह सिर्फ पहला अध्याय था।
अब अगला चरण मनाली में इंतज़ार कर रहा था।
दोनों यात्राएँ… एक साथ आगे बढ़ रही थीं
एक सबसे रहस्यमयी युवा बिज़नेस टाइकून,
जो खुद भी नहीं जानता
कि उसके दादा क्यों और किस लिए उसे बुला रहे हैं।
दूसरी—
एक साधक लड़की,
जो साधारण दिखती है,
लेकिन जिसकी आत्मा में सालों पुराना बंधन जाग रहा है।
दोनों अलग-अलग रास्तों से
एक ही दिशा में आगे बढ़ रहे थे—
मनाली।
जहाँ न सिर्फ उनकी राहें मिलनी थीं,
बल्कि उनकी किस्मतें…
राज़…
और उन आत्माओं की परछाइयाँ—
सब एक जगह आने वाली थीं।
और यह संयोग नहीं था।
यह किसी अदृश्य योजना का हिस्सा था।
अगर आप चाहें तो
मैं अगला हिस्सा आगे बढ़ाऊँ, जहाँ—
अभिनव मनाली पहुँचकर दादा से पहली मुलाकात करेगा
गणिका मनाली की सीमा पार करते ही “किसी अनजानी आत्मा” से टकराएगी
तो दोस्तों कैसा लगा आपको आज का ये एपिसोड ?जरूर बताइएगा मिलते आपसे अगले एपिसोड में


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