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गणिका मर गई

                                                                            एपिसोड -3 

पिछले एपिसोड में आपने पड़ा ,

घर का माहौल पल में शांत से सिहरनभरा हो गया।
क्या लंदन जाना अब सुरक्षित है?
आखिर क्या रिश्ता है इन दोनों का गणिका और अभिनव इस समय दोनों ही एक डरावने दौर  गुजर रहे है !
क्या ये गणिका मर गई?
क्या अब अभिनव की बारी है?
आखिर कैसे ये दोनों लड़ेंगे उन अनजान ताकतों से जिसका न तो इन्हें को अनुमान है और न ही कोई खबर।
गणिका कुंड में कहां है?
और अब अभिनव की सांसों का उखड़ना!
क्या ये संकेत है
या ये संकेत है उस खतरे का…

अब आगे ,

गुफा का वातावरण धीरे-धीरे भारी होता जा रहा था। नीला प्रकाश जैसे ही गायब हुआ, गुफा की छत से महीन रेत झरने लगी। हवा अचानक ठंडी हो गई… इतनी ठंडी कि सांस बाहर निकलते ही धुंध बन रही थी। कुंड अब शांत नहीं था — उसकी सतह पर हल्के बुलबुले उठने लगे, जैसे कोई भीतर से धीरे-धीरे बाहर आने की कोशिश कर रहा हो। संध्या देवी का दिल फिर से दहशत से भर गया।
“क्या… गणिका वापस आ रही है?” उन्होंने उम्मीद से देखा, पर रमा दादी की आँखों में चिंता थी।
“नहीं संध्या… ये उसकी वापसी की आहट नहीं है। ये कुंड जाग रहा है… इसका मतलब है कि आधी प्रक्रिया अभी बाकी है।”
महेश्वर घबरा गए —
“आधी प्रक्रिया? और कितना सहेंगी मेरी बच्ची!”
रमा दादी ने काँपते हुए कहा,
“कुंड हमेशा दो आत्माओं को जोड़कर ही खुलता है…
गणिका अकेली नहीं है अब। कहीं न कहीं… कोई और भी उसी समय उसकी आत्मा से जुड़ा है।”
संध्या ने अविश्वास में फुसफुसाया —
“कौन? कौन है वो?”
रमा दादी ने आँखें बंद कीं, गहरी साँस ली, और एकदम धीमे स्वर में बोलीं —
“दूर… बहुत दूर… कोई लड़का… जिसकी आँखों में नीली चमक उतर चुकी है।”
उनकी बात पूरी हुई ही थी कि कुंड की सतह पर अचानक बिजली-सी चमक फूटी। पानी उफनकर उछला और गुफा की दीवारों से टकराया। महेश्वर और संध्या पीछे हट गए। उसी क्षण दोनों साधक कुंड की गहराइयों से प्रकट हुए — पर उनकी शक्लें अब पहले जैसी नहीं थीं। उनकी त्वचा पर जली हुई राख चिपकी थी, और आँखें एकदम सफ़ेद। वे पानी के ऊपर बिना डूबे खड़े थे, मानो जल उन्हें छू भी नहीं सकता।
दोनों ने एक साथ कहा —
“बंधन बन चुका है। अब दूसरा बच्चा जोखिम में है। अगर वह टूट गया… तो द्वार खुल जाएगा।”
संध्या हिल गई —
“दूसरा बच्चा? कौन?”
तभी साधकों ने अपनी हाथ की मुद्राएँ बदलीं।
कुंड के ऊपर हवा में धुआँ इकट्ठा हुआ…
और एक धुंधली आकृति बनने लगी —
एक लड़का…
धीरे-धीरे वह चेहरा साफ़ हुआ…
और रमा दादी ने घबराकर कहा —
“ये वही है… जो हर रात गणिका का सपना देखता है…”
संध्या फुसफुसाईं —
“कौन है ये बच्चा…?”
रमा दादी की आवाज़ भारी हो गई —
“अभिनव। उसका नाम अभिनव है।
उसकी सांसें जितनी उखड़ेंगी… गणिका उतनी गहराई में जाएगी।”
संध्या को लगा पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई है।
“तो… अगर उस बच्चे को कुछ हुआ…”
रमा दादी ने पूरा किया —
“गणिका कभी वापस नहीं आएगी।”
गुफा की ठंडी हवा अचानक गर्म हुई…
जैसे कोई अदृश्य शक्ति नाराज़ हो गई हो
उधर अभिनव का कमरा…
कमरा अब भी अंधेरे में डूबा था। मीनल ने मोबाइल की फ्लैशलाइट ऑन की और कांपती हुई आवाज़ में पति को बुलाया। नौकर भागकर डॉक्टर लाने गए। पर किसी की समझ नहीं आ रहा था कि अचानक यह क्या हुआ।
अभिनव फर्श पर पड़ा था, और उसकी उंगलियाँ अनजाने में कुछ पकड़ने की कोशिश कर रही थीं… जैसे वो किसी का हाथ थामना चाहता हो।
“अभि, उठो बेटा!”
मीनल की आवाज़ टूट रही थी।
“हम लंदन जा रहे हैं न… अब सब ठीक होगा… प्लीज़ आँख खोलो…”
पर तभी अभिनव की सांसें तेज़ी से उखड़ने लगीं।
उसका शरीर हल्का-सा काँपा।
और उसके होठों से एक नाम निकला —
“ग…णिका…”
मीनल अवाक रह गईं।
आरव और नैना डर से रोने लगे।
“वो किसे बुला रहा है?” मीनल चीखी।
अभिनव की पलकें फड़फड़ाईं…
और एक पल के लिए उसकी आँखों की नीली चमक तेज़ होकर पूरे कमरे को रोशन कर गई।
सामने हवा में एक छोटी-सी लड़की की धुंधली आकृति दिखी —
भीगी हुई, डरी हुई…
उसकी उंगलियाँ मदद के लिए फैली हुई…
और फिर वह आकृति गायब हो गई।
मीनल की चीख गूँज उठी —
“ये क्या हो रहा है मेरे बच्चे के साथ? कौन है ये लड़की??”
लेकिन इस बार…
अभिनव के होंठ धीरे से हिले —
“वो… अकेली है… अंधेरे में…”
और उसकी नब्ज़ लगभग रुकने लगी।
⭐ गुफा में उसी पल…
कुंड का पानी अचानक गहराई से उफना —
और बाहर फेंकी हुई लहरों में
गणिका का छोटा-सा हाथ ऊपर उभर आया।
संध्या ने चीख मारी —
“मेरी बच्ची!!”
पर हाथ तुरंत वापस नीचे खींच लिया गया…
जैसे कोई ताकत उसे गहराइयों में ले जा रही हो।
दोनों साधकों ने आँखें बंद कर लीं और एक साथ बोले —
“जब तक उस लड़के की आत्मा स्थिर नहीं होती…
गणिका को कोई नहीं बचा सकता।”
रमा दादी की आँखों में आँसू भर आए।
उन्होंने फुसफुसाकर कहा —
“उनकी नियति एक हो चुकी है…
एक की सांसें दूसरे की जिंदगी हैं।”
कुंड के ऊपर उभरा वह छोटा-सा हाथ जैसे ही पानी में खिंच गया, संध्या देवी ने पूरी ताकत से आगे बढ़ने की कोशिश की। उनके पैरों में बंधा अदृश्य बंधन उन्हें रोक रहा था… फिर भी उन्होंने खुद को ज़बरदस्ती खींचते हुए कुंड की ओर झुकाया। उनकी हथेलियाँ पत्थर पर घिस गईं, खून रिसने लगा, लेकिन वो रुकने वाली नहीं थीं।
“गणिका… मेरी बच्ची… मैं आ रही हूँ…”
उनकी आवाज़ टूट चुकी थी।
महेश्वर ने उन्हें थाम लिया, आँखों में आंसुओं का सैलाब लिए—
“संध्या… खुद को संभालो… इस रास्ते में पैर रखना मौत को बुलाना है…”
पर संध्या ने उन्हें झटक दिया।
“अगर मेरी बच्ची को जाना होगा… तो मैं उससे पहले खुद डूब जाऊँगी!”
उनकी चीख गुफा की दीवारों से टकराकर गूँजी।
दोनों साधकों ने आंखें खोलीं।
उनकी ठंडी, भावहीन नजरें सीधे संध्या पर उठीं।
एक साधक ने गंभीर स्वर में कहा—
“माँ… जिस मार्ग पर आपकी बच्ची है, वहाँ शरीर नहीं… सिर्फ आत्मा जा सकती है।
आपकी देह इस द्वार को पार नहीं कर सकती।
अगर आप आगे बढ़ीं… तो आपका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।”
संध्या की रुलाई फूट पड़ी।
“तो मैं क्या करूँ? मेरी बेटी को कौन बचाएगा? कोई तो रास्ता होगा!”
रमा दादी ने अपने कांपते हाथ उनकी पीठ पर रखे।
उनकी आँखों में अनुभव की गहराई थी—
“गणिका अभी भी जीवित है…
पर उसका जीवन अब किसी और से बंध चुका है।
उस लड़के की सांसों पर उसकी वापसी निर्भर है।”
महेश्वर ने भारी आवाज़ में पूछा—
“ये लड़का… अभिनव… क्यों? कैसे?”
रमा दादी ने गहरी साँस ली।
“क्योंकि नियति उनकी आत्माओं को पहले से जोड़ चुकी है।
गणिका जिस रात पहली बार जंगल में डर से भागी थी…
उस रात किसी दूर जगह पर, उसी समय, उसी क्षण…
उस लड़के की आत्मा जागी थी।”
महेश्वर कुछ समझ नहीं पा रहे थे।
“तो क्या… ये दोनों एक-दूसरे के सपनों में आते हैं?”
दादी ने धीरे-धीरे कहा—
“नहीं बेटा…
ये दोनों अब एक ही सपने में जीते हैं।”
गुफा के भीतर अचानक तेज़ कंपन हुआ।
कुंड की सतह से अब हल्की हल्की रोशनी उठने लगी।
मानो नीचे किसी दूसरी दुनिया के दरवाजे खुल रहे हों।
दोनों साधक चट्टानों के बीच चलते हुए कुंड के सामने आकर खड़े हो गए।
उनकी आवाज़ गुफा में गूँज उठी—
“समय कम है।
लड़का कमज़ोर हो रहा है…
अगर उसकी आत्मा टूट गई…
तो गणिका हमेशा के लिए अंधेरे में डूब जाएगी।”
⭐ उधर अभिनव…
घर में अफरा-तफरी मची थी।
डॉक्टरों को बुलाने के लिए फोन लगाए जा रहे थे,
नौकर भाग-दौड़ कर रहे थे,
पर किसी को समझ नहीं आ रहा था कि अचानक तीनों बच्चों को एक साथ क्या हो गया।
मीनल अभिनव के पास घुटनों के बल बैठी थी।
उसका सिर अपनी गोद में लिए वह उसके चेहरे पर बार-बार पानी छिड़क रही थी।
“अभि… बेटा… मेरी बात सुनो… प्लीज़ आँख खोलो…”
लेकिन अभिनव की सांसें लगातार उखड़ रही थीं।
उसके सीने पर हर उठान ऐसा था जैसे किसी सीढ़ी से गिरते हुए वह खुद को संभालने की कोशिश कर रहा हो।
आरव और नैना दोनों भी कमजोर होते जा रहे थे।
नैना ने रोते हुए कहा—
“मम्मा… भइया हमें क्यों नहीं देख रहे…”
आरव की आवाज़ भारी हो गई—
“मुझे… अंधेरा दिख रहा है…”
और फिर दोनों एक साथ मम्मा के पास गिर पड़े।
मीनल का दिल चीख बनकर बाहर आ गया।
“हे भगवान… क्या हो रहा है मेरे बच्चों को!”
मीनल ने अभिनव को उठाकर अपने सीने से लगाया—
“अभिनव… वापस आओ बेटा… मैं यहाँ हूँ…”
पर तभी…
अभिनव के शरीर से एक ठंडी हवा निकली।
कमरे की खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।
पर्दे उड़े…
लाइट्स फिर से जलकर एक पल में बुझ गईं…
और कमरे के बीच हवा में वही नीली रोशनी दोबारा प्रकट हुई।
इस बार वह और अधिक स्पष्ट थी।
और उसके भीतर गणिका का चेहरा और अधिक साफ़ दिख रहा था—
पीला, डरा हुआ, पानी में डूबा हुआ…
और उसके होंठों से केवल एक शब्द निकला—
“अभि…”
अभिनव का शरीर झटका खाकर ऊपर उठा,
और अचानक उसके सीने पर नीला प्रकाश समा गया।
नैना चीख पड़ी।
मीनल के हाथ काँपने लगे।
अभिनव की पलकें धीरे-धीरे खुलीं…
लेकिन अब उसकी आँखों में इंसानी चमक नहीं थी।
वह किसी और जगह देख रहा था…
किसी और दुनिया… किसी दूसरे अंधेरे में—
जहाँ गणिका का हाथ अंधेरे में किसी को खोज रहा था।
और उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“मैं आ रहा हूँ…”

तो दोस्तों कैसा लगा आपको आज का ये एपिसोड ?जरूर बताइएगा मिलते आपसे अगले एपिसोड में

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Sirf Sadharan

Pro
सादा जीवन उच्च विचार जीवन का हो आधार