
एपिसोड-2
पिछले एपिसोड में आपने पड़ा ,
अभिनव मुस्कुराया…
मगर वो मुस्कान अधूरी थी।
क्योंकि उसके सपनों में जो चेहरा था…
वो इस दुनिया से कहीं दूर था।
रह गया एक सवाल:
क्या ये सिर्फ एक सपना है, या कोई कड़ी जो दो अजनबियों को जोड़ रही है?
और क्या लंदन की दूरी… उस रहस्य से छुटकारा दिला पाएगी?
पड़ते रहिए आगे.......
अब आगे ,
घने जंगलों की सिसकियों के बीच,
चार लोगों की परछाइयाँ चुपचाप पेड़ों के बीच सरक रही थीं —
संध्या देवी, महेश्वर, रमा दादी,
और उनके कांपते हाथों में बेसुध पड़ी गणिका।
उसकी साँसें धीमी थीं, शरीर बेजान...
जैसे उसकी आत्मा धीरे-धीरे उससे दूर जा रही हो।
उनके सामने एक चट्टानों से ढँकी पुरानी गुफा थी,
जिस पर वक़्त की धूल नहीं — भय का पर्दा चढ़ा था।
रमा दादी ने जैसे ही एक विशेष मंत्र पढ़ा —
गुफा की दीवारों में दरारें उभर आईं…
और उसका मुँह खुद-ब-खुद खुल गया।
भीतर घुप्प अंधेरा था…
जैसे ही वे लोग आगे बढ़े,
गुफा के गर्भ में एक जोर की हवा चली…
और तभी — दो आकृतियाँ तेजी से सामने आईं।
दो साधक… लंबे केसरिया वस्त्रों में…
आँखों में भस्म का टीका, और हाथों में चमकता हुआ त्रिशूल।
वो लोग चल नहीं रहे थे बस हवा ने उन्हें उठाया हुआ था।
बिना एक शब्द कहे, उन्होंने अपनी आंखे गणिका पर डाली और गणिका महेश्वर की गोदी से सीधा हवा में उठ गई। जैसे हवा ने ही गणिका को गोदी में उठा लिया हो।
वही महेश्वर , गणिका की दादी और संध्या अपनी जगह पर जम गए थे जैसे की उनके पैर पत्थर के होकर जमीन से जुड़ गए हो।
दोनों साधुओँ ने अपनी आंखे जल के कुंड की तरफ दी जिससे गणिका सीधा जाकर कुंड में गिर गई।
संध्या चीखीं ! महेश्वर , और गणिका की दादी ने अपनीआंखे बंद कर ली। लेकिन संध्या जिससे लगा था की शायद उसकी बेटी यहाँ आकर ठीक हो जाएगी , वो इस तरह से अपनी बेटी डूबता हुआ देख कर खुद को संभल नहीं पा
रही थी।
वो हिल नहीं पा रही थी। वो केवल रो रो कर चीला कर कह रही थी गणिका मेरी बच्ची मेरी बच्ची मुझे छोड़कर मत जाओ। लेकिन कोई उन्हें सुनने वाला नहीं था।
दोनों साधक भी उसी कुंड में चले गए जहा गणिका थी।
"नहीं!! मत करो ये!!"महेश्वर, संध्या और रमा दादी ज़मीन पर गिर पड़े।
संध्या ज़ोर-ज़ोर से रोने लगीं…
"मेरी बच्ची... मेरी जान… इसे मत ले जाओ…"
गुफा की दीवारों से टकराकर उनकी चीखें गूंजने लगीं।
लेकिन कुंड की सतह अब स्थिर हो चुकी थी…
गणिका और दोनों साधक भीतर कहीं गुम हो गए थे। …
तभी कुंड का पानी हिलने लगा उस कुंड में से उन साधको के मंत्रो उच्चारण ही ध्वनि आने लगी। पूरी गुफा में भयानक चीखें सुअनी देनी लगी। कुंड के ऊपर कला धुँआ पानी की सतह पर छा गया।
दूसरी और रात का अंधकार धीरे-धीरे घर पर छा चुका था। पूरे घर में हलचल थी—लंदन जाने की तैयारी जोरों पर थी। मीनल कुछ दवाइयाँ और जरूरी कागज़ात पैक कर रही थी, वहीं नौकरानियां सामान समेटने में लगी थीं।
उधर आरव और नैना, खिलखिलाते हुए अभिनव को खेलने के लिए मनाने की कोशिश कर रहे थे।
"चलो ना भैया! आखिरी रात है इंडिया में," नैना बोली।
"हाँ! छुपन-छुपाई खेलते हैं," आरव ने उत्साह से कहा।
लेकिन अभिनव, कुछ सोचते हुए, उन दोनों से बचते-बचाते चुपचाप मम्मा मीनल के कमरे की ओर बढ़ गया। उसकी चाल में एक अजीब सी थकावट और बेचैनी थी। जैसे कोई अदृश्य भार उसके सीने पर रखा हो।
कमरे के पास पहुँचते ही उसका सिर घूमने लगा।
"उफ्फ..." उसने दीवार का सहारा लिया।
उसे साँस लेने में तकलीफ़ होने लगी थी... जैसे हवा भारी हो गई हो... जैसे कमरे की दीवारें उस पर झुकने लगी हों।
अचानक उसकी आंखों में एक जलन सी हुई। पलकों के नीचे से लाली उभरने लगी... जैसे खून रिसने को तैयार हो।
"भैया?" एक धीमी मासूम आवाज़ ने उसकी तंद्रा तोड़ी।
नैना वहीं खड़ी थी—थोड़ी घबराई हुई, थोड़ी मासूम।
"आप ठीक हो? आपकी आंखें ऐसे क्यों लग रही हैं?" उसने डरते हुए पूछा।
अभिनव कुछ कहने ही वाला था कि आरव भी पीछे से आ गया। पर तभी... आरव ने अपने सीने को पकड़ा।
"मम्मा..." उसने कमजोर सी आवाज़ में कहा, "मुझे अजीब लग रहा है..."
मीनल भागती हुई आई।
"क्या हुआ मेरे बच्चों को? ये दोनों ऐसे क्यों..." उसकी आँखें चौड़ी हो गईं।
तभी खिड़की के बाहर किसी उल्लू की डरावनी आवाज़ गूंज उठी।
घर का माहौल पल में शांत से सिहरनभरा हो गया।
क्या लंदन जाना अब सुरक्षित है?
आखिर क्या रिश्ता है इन दोनों का गणिका और अभिनव इस समय दोनों ही एक डरावने दौर गुजर रहे है !
क्या ये गणिका मर गई?
क्या अब अभिनव की बारी है?
आखिर कैसे ये दोनों लड़ेंगे उन अनजान ताकतों से जिसका न तो इन्हें को अनुमान है और न ही कोई खबर।
गणिका कुंड में कहां है?
और अब अभिनव की सांसों का उखड़ना!
क्या ये संकेत है
या ये संकेत है उस खतरे का…
तो दोस्तों कैसा लगा आपको आज का ये एपिसोड ?जरूर बताइएगा मिलते आपसे अगले एपिसोड में


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