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मुझे घर जाना है


                                                                             एपिसोड - 1 

अरावली की घनी पहाड़ियों के बीच, एक छोटी-सी लड़की बेतहाशा भाग रही थी। उसके कपड़े धूल और पसीने से सने हुए थे, साँसें बेकाबू थीं और चेहरा डर से बिल्कुल सफ़ेद।

पेड़ों की ओट से आती वह आवाज़ अजीब नहीं... रूहानी थी — जैसे किसी ने भूतकाल को जगा दिया हो।
"छोड़ दो मुझे "मैं कहाँ हूँ! मुझे घर जाना है!"
उसकी फुसफुसाती आवाज़ में मासूमियत से ज़्यादा दहशत थी। वो तेज़ी से भागी, जैसे धरती उसके पैरों तले काँप रही हो।
कुछ साये उसके पीछे थे — दिखाई नहीं दे रहे थे, लेकिन मौजूद थे... हर ओर।
हर कदम के साथ समय जैसे रुकता जा रहा था। हर शाखा, हर पत्ता... जैसे साँस रोके खड़ा था।
और तभी...
वो लड़की एक पुराने, जर्जर कुएं में गिर गई।
उसकी चीख़ हवा में गूँजी... और फिर एक भयानक अंधकार ने सब कुछ निगल लिया।
पलटते ही सीन बदला —
एक शानदार कमरे में, एक 12 वर्षीय लड़का अभिनव बिस्तर से उछल पड़ा।
साँसें तेज़...
दिल बेकाबू... और माथा पसीने से तरबतर।
"फिर वही सपना..."
उसने धीमी आवाज़ में कहा, और खिड़की की ओर देखा।
रात के अंधेरे में कुछ था — कोई सच, जो अब भी छुपा हुआ था।
तभी कमरे में दरवाज़ा खुला।
"अभी! क्या हुआ बेटा?"
मीनल भसीन, उसकी माँ, घबराकर भीतर आईं।
उन्होंने उसका माथा छुआ, जो तप रहा था।
"फिर से वही बुरा सपना देखा?"
अभिनव ने चुपचाप सिर हिलाया। मीनल ने उसे अपनी गोद में लेटाया और बालों में हाथ फेरते हुए धीमे स्वर में लोरी गाने लगीं। धीरे-धीरे अभिनव की पलकों ने झुकना शुरू किया…
मीनल को लगा कि वो सो गया है।
उन्होंने उसे चुपचाप कम्बल ओढ़ाया और रूम से बाहर निकल गईं —
अपने NGO की मीटिंग के लिए।
पर अंदर… अभिनव अब भी जाग रहा था।
वो उठकर अपनी पुरानी नीली डायरी निकाला — वही डायरी, जिसमें वो हर रात के सपने दर्ज करता था।
उसने काँपते हाथों से लिखा। "जंगल... मंदिर की घंटियाँ... अँधेरी परछाइयाँ... और एक बच्ची।
वो भाग रही थी... मदद माँग रही थी।"
हर शब्द उसके भीतर डर और जिज्ञासा दोनों भर रहा था।
"कौन है वो? और मैं क्यों उसे हर रात देखता हूँ?"
उसने खुद से पूछा, लेकिन जवाब आज भी उतना ही रहस्यमय था।
वहीं, दूसरी ओर अरावली की पहाड़ियों में...
वही बच्ची — गनिका, अब संध्या देवी की गोद में काँप रही थी।
"वो फिर आया था, माँ..."
उसकी आवाज़ बहुत धीमी, लेकिन कांपती हुई थी।
गनिका की त्वचा पसीने से भीगी हुई थी, और आँखें खुली थीं, लेकिन उनमें जीवन की रोशनी नहीं थी।
वो कोई सपना नहीं देख रही थी...
वो किसी और के सपने में जी रही थी।
संध्या देवी ने उसे सीने से लगा लिया, उनकी आँखें भर आईं।
"ऐसा कैसे हो सकता है, प्रभु?"
"क्या उसका अतीत अब उसके वर्तमान में उतर रहा है?"
इधर अभिनव... एक सपना लिख रहा था।
उधर गनिका... उसी सपने को जी रही थी।
इन दोनों के बीच कोई अनदेखा धागा था —
जो दो आत्माओं को जोड़ रहा था…
पर वो धागा इतना उलझा हुआ था, कि उसे सुलझाने में ज़िन्दगी दांव पर लग सकती थी।
सूरज की कोमल किरणें जैसे कमरे में चुपचाप दाखिल हो रही थीं।
उनकी नरम गर्माहट ने जब अभिनव के मासूम चेहरे को छुआ —
तो उसकी पलकों में हलचल हुई।
उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं, और कुछ पल यूँ ही छत को देखता रहा…
फिर चुपचाप उठकर बालकनी की ओर बढ़ा।
खुले आकाश के नीचे उसने अपनी कोहनियाँ रेलिंग पर टिकाईं…
और आँखें बंद कर लीं।
हवा में सुबह की ठंडक थी…
लेकिन उसके भीतर एक अजीब-सी गर्म बेचैनी थी।
कहीं दूर मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं…
"हर रात वही सपना… वही लड़की… और वही जंगल…"
उसने खुद से कहा,
"क्या ये कभी बंद होगा?"
वहीं दूसरी ओर…
संध्या देवी सुबह की पूजा के बाद जैसे ही गनिका के कमरे की ओर बढ़ीं,
कमरे का दरवाजा खोला।
भीतर घना काला धुआं था…
हवा भारी… और वातावरण में डरावनी गंध।
गनिका बिस्तर पर थी — लेकिन उसकी आँखें बंद थीं।
चेहरा धीरे-धीरे काला पड़ता जा रहा था।
शरीर अकड़ चुका था… साँसें थम-सी गई थीं।
"गनिका!! मेरी बच्ची!! क्या हुआ तुम्हे?"
संध्या देवी चीख पड़ीं —
वो दौड़ीं और गनिका को अपनी गोद में भर लिया।
"महेश्वर जी!! माँ! जल्दी आइए!!!"
संध्या की चीख़ें अब घर की हर दीवार से टकरा रही थीं।
"गनिका मेरी बच्ची… आँखें खोलो ना… बोलो कुछ…"
गनिका की उंगलियाँ बर्फ-सी ठंडी थीं,
पर होठों पर एक फुसफुसाहट थी —
तभी कमरे का दीया अपने आप बुझ गया।
दीवार पर एक परछाईं उभरी —
जो धीरे-धीरे गनिका के सिर की ओर झुकती चली गई।
"यह कोई बीमारी नहीं है…"
पीछे से काँपती आवाज़ आई —
रमा दादी की।
उसे बाबा के पास ले जाना होगा।"
महेश्वर कमरे में दाखिल हुए,
गनिका को गोद में उठाया,
और बोझिल चुप्पी के बीच वे घर से निकल पड़े।
वहीं, दूसरी ओर…
टक-टक।
"अभी... उठ गए बेटा?"
मीनल भसीन कमरे में दाखिल हुईं।
चेहरे पर मुस्कान थी,
लेकिन आँखों में थकान और अनकही चिंता।
उन्होंने बेटे को गले लगाया —
"चलो, फ्रेश हो जाओ। पैकिंग पूरी हो गई है।
आज ही हमें लंदन के लिए निकलना है… अब हम वहीं रहेंगे।"
"इतनी जल्दी, मम्मा?"
अभिनव की आवाज़ में सवाल था।
"कभी-कभी, कुछ जगहें ज़ख्म बन जाती हैं बेटा…
और हमें खुद को उनसे दूर ले जाना पड़ता है।
ताकि ज़िंदगी फिर से साँस ले सके।"
"पापा चाहते हैं कि तुम एक नई शुरुआत करो…
और शायद पीछे जो छूट रहा है, वो भुला सको।"
अभिनव चुप रहा…
पर उसका मन अभी भी अरावली की ओर टिका था।
तभी पीछे से दो आवाज़ें आईं —
"मम्मा! भइया अभी तक तैयार नहीं हुआ?"
"जल्दी करो न! हम लंदन जा रहे हैं!"
आरव (10) और नैना (7) —
अभिनव के छोटे भाई-बहन।
आरव हमेशा सवालों से भरा,
और नैना — परियों की दुनिया में खोई रहने वाली।
"भइया, वहाँ बर्फ गिरेगी ना?" — नैना
"और Hogwarts भी होगा?" — आरव
अभिनव मुस्कुराया…
मगर वो मुस्कान अधूरी थी।
क्योंकि उसके सपनों में जो चेहरा था…
वो इस दुनिया से कहीं दूर था।
रह गया एक सवाल:
क्या ये सिर्फ एक सपना है, या कोई कड़ी जो दो अजनबियों को जोड़ रही है?
और क्या लंदन की दूरी… उस रहस्य से छुटकारा दिला पाएगी?
पड़ते रहिए आगे.......

"मुझे पता है आप लोग चुपके-चुपके पढ़ रहे हैं और आपको कहानी पसंद आ रही है (Views देख कर पता चल रहा है 😉)। लेकिन एक छोटा सा कमेंट मेरे लिए 'बूस्टर डोज़' की तरह काम करता है। क्या इस सफर में आप मेरे साथ हैं?"

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Sirf Sadharan

Pro
सादा जीवन उच्च विचार जीवन का हो आधार