
Chapter 10
पिछले भाग में आपने पढ़ा,
तुम मेरी इबादत हो, मेरी इकलौती प्यास... और तुम्हें पीने का हक सिर्फ मेरा है... सिर्फ मेरा!"
यह कहते ही उसने अपना अधिकार जताते हुए उसके गले और कंधे के जोड़ पर अपनी मुहर लगा दी।
अब आगे,
बिजली की एक ज़ोरदार गड़गड़ाहट के साथ अप्सरा की आँखें खुल गईं। वह पसीने से तर-बतर थी और उसकी साँसें ऐसे चल रही थीं जैसे वह अभी-अभी मीलों लंबी दौड़ लगाकर आई हो। खिड़की के बाहर काली घटाएँ छाई थीं और बारिश की बूंदें कांच पर किसी के दस्तक देने की तरह गिर रही थीं।
अप्सरा ने कांपते हुए हाथ से अपनी गर्दन को छुआ। उसे अभी भी वहीं एक सिहरन महसूस हो रही थी, जैसे उस पुरुष के होंठों की तपिश अभी भी वहीं ठहरी हो।
"ये सपना नहीं था..." उसने सूखी हुई आवाज़ में फुसफुसाया।
वह उठी और लड़खड़ाते कदमों से आईने के सामने जाकर खड़ी हुई। उसने कांपते हाथों से अपनी कमीज़ का गला थोड़ा सरकाया। आईने में जो दिखा, उसे देखकर उसकी चीख गले में ही दब गई।
उसके गले और कंधे के जोड़ पर, ठीक उसी जगह जहाँ सपने में उस पुरुष ने अपने होंठ रखे थे, वहाँ एक गहरा लाल और सुनहरा निशान उभरा हुआ था। वह कोई साधारण चोट या खरोंच नहीं थी। वह एक प्राचीन नक्काशी जैसा दिख रहा था—एक ऐसा चिन्ह जो न तो मिटाया जा सकता था और न ही छुपाया जा सकता था। वह निशान हल्का-हल्का धड़क रहा था, जैसे उसके अंदर कोई अपनी सांसें ले रहा हो।
अप्सरा ने उसे मिटाने की कोशिश की, उसे रगड़ा, पर जैसे ही उसने उस निशान को छुआ, उसके पूरे शरीर में बिजली जैसी एक लहर दौड़ गई। उसे फिर वही भारी आवाज़ सुनाई दी, जो कमरे के सन्नाटे से नहीं, बल्कि उसकी अपनी रूह के अंदर से आ रही थी
" तुम्हें पीने का हक सिर्फ मेरा है... सिर्फ मेरा!"

अगली सुबह, अप्सरा ने अपनी गर्दन को एक गहरे स्कार्फ से पूरी तरह ढँक लिया। घर से निकलते वक्त चाचा संजय उसे शक की नज़रों से देख रहे थे, पर मेघना ने उन्हें एक तीखी नज़र से चुप करा दिया। चाची मेघना आज भी बिल्कुल शांत और नम्र बनी हुई थी, जैसे उसका पुराना 'ज़हरीला' रूप किसी ने निकाल कर फेंक दिया हो।
जैसे ही अप्सरा ने कॉलेज के कैंपस में कदम रखा, उसे लगा जैसे हवा का रुख बदल गया है।
कैंटीन के बाहर आज सन्नाटा था। लोग ग्रुप्स में खड़े थे और कानाफूसी कर रहे थे। तभी उसकी सहेली माधुरी दौड़ती हुई उसके पास आई। उसका चेहरा सफेद पड़ा हुआ था।
"अप्सरा! तूने सुना?" माधुरी ने उसका हाथ पकड़कर उसे एक तरफ खींचा। "तान्या... तान्या पागल हो गई है! रात को उसके कमरे में कुछ ऐसा हुआ कि वह अपनी ही ज़बान काट बैठी। लोग कह रहे हैं उसने अपने कमरे की दीवारों पर अपने खून से सिर्फ़ यही लिखा है मुझे माफ कर दो ।"
अप्सरा के पैर कांपने लगे। "और... और रॉकी?
माधुरी ने इधर-उधर देखा और फुसफुसाई, "रॉकी आज कॉलेज नहीं आया। खबर मिली है कि वो अपने घर के अँधेरे कोने में दुबका बैठा है और किसी को भी पास नहीं आने दे रहा। वो सिर्फ़ एक ही बात चिल्ला रहा है कि 'वो साया मुझे खा जाएगा'।"
अप्सरा का हाथ अनजाने में अपने स्कार्फ के नीचे छिपे उस निशान पर चला गया। वह निशान अब और भी तेज़ धड़कने लगा था, जैसे वह इस 'इंसाफ' का जश्न मना रहा हो।
माधुरी की बातें सुनकर अप्सरा के कानों में जैसे गरम सीसा पिघलकर गिर गया हो। "मुझे माफ़ कर दो..." तान्या जैसी घमंडी लड़की ने अपने खून से ये शब्द लिखे? अप्सरा को अपनी आँखों के सामने वही मंजर घूमने लगा जब तान्या ने उसका लॉकेट खींचकर जूस की गंदगी में फेंका था।
"अप्सरा! तू ठीक तो है? तू काँप क्यों रही है?" माधुरी ने उसे झकझोरा।
अप्सरा ने मुश्किल से अपना गला साफ़ किया। "मैं... मैं ठीक हूँ माधुरी। बस ये सब सुनकर बहुत डर लग रहा है।"
वह माधुरी से नज़रें चुराकर तेज़ कदमों से कॉरिडोर की तरफ बढ़ गई। उसे महसूस हो रहा था कि उसके स्कार्फ के नीचे छिपा वो निशान अब सिर्फ धड़क नहीं रहा था, बल्कि उसमें से एक ऐसी लहर निकल रही थी जो उसके पूरे शरीर को सुन्न कर रही थी।
अप्सरा सीधा कॉलेज के पुराने वॉशरूम की तरफ भागी। उसे अपनी गर्दन पर हो रही जलन बर्दाश्त नहीं हो रही थी। उसने अंदर जाकर दरवाज़ा बंद किया और आईने के सामने खड़ी हो गई।
जैसे ही उसने अपना स्कार्फ हटाया, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
वह निशान अब लाल नहीं, बल्कि गहरा काला और सुनहरा पड़ चुका था। और सबसे अजीब बात... वह निशान अब उसके गले से फैलकर उसकी छाती की तरफ बढ़ रहा था, जैसे कोई बेल (vine) धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही हो।
लेकिन जो चीज़ सबसे ज्यादा डरावनी थी, वो थी अप्सरा की अपनी शक्ल।
आईने में उसे जो लड़की दिख रही थी, वो 'अप्सरा' तो थी, पर उसमें एक ऐसी चमक, एक ऐसी दिव्यता आ गई थी जो इंसानी नहीं लग रही थी। उसकी आँखें पहले से ज्यादा गहरी और काली थीं, उसकी त्वचा पत्थर की तरह बेदाग़ और सफ़ेद चमक रही थी। वह बिल्कुल वैसी ही लग रही थी जैसी उसने रात को झरने वाले सपने में देखी थी।
"ये मैं... ये मैं नहीं हूँ," वह बुदबुदाई।
तभी, आईने पर जमी हुई धुंध अचानक जमने लगी। कांच पर बाहर से किसी ने हाथ नहीं फेरा, पर अंदर से एक आकृति उभरने लगी।
अप्सरा के ठीक पीछे, अंधेरे से एक विशाल परछाईं निकली। उसने देखा कि आईने में उसके कंधों पर दो बड़े, मज़बूत हाथ रखे हुए हैं। वह मुड़ी, पर पीछे कोई नहीं था। लेकिन आईने में... आईने में वह साया उसे अपनी बाहों में भरे हुए था।
उस साये का चेहरा धुंधला था, पर उसकी आँखें... वो दहकते हुए अंगारों जैसी लाल थीं।
उसकी भारी आवाज़ वॉशरूम की टाइल्स से टकराकर गूँजी, जैसे कोई पहाड़ों के बीच से पुकार रहा हो:
"देख रही हो? तुम धीरे-धीरे अपनी असलियत की तरफ बढ़ रही हो। ये दुनिया तुम्हारे लायक नहीं है... तुम सिर्फ मेरे तख़्त की शोभा हो।"
अप्सरा की सांसें उखड़ने लगीं। "आपने... आपने तान्या और रॉकी के साथ ऐसा क्यों किया? वो... वो मर जाएंगे!"
आईने में उस साये ने अपना सिर झुकाया और अप्सरा के कान के पास अपने अदृश्य होंठ ले गया।
"मौत तो बहुत छोटी सज़ा है उस गुस्ताख़ी की, जो उन्होंने तुम्हें छूकर की। मैंने कहा था न... तुम्हारी रूह, तुम्हारा जिस्म, तुम्हारी एक-एक सांस पर दावा मेरा है।
अचानक वॉशरूम का नल अपने आप खुल गया। पानी की जगह उसमें से भाप निकलने लगी। अप्सरा को अपनी कमर पर वही 'पज़ेसिव' पकड़ महसूस हुई, जिसने उसे आईने की तरफ और करीब खींच लिया।
"डरो मत... तान्या और रॉकी ने सिर्फ मेरा खौफ़ चखा है।
वॉशरूम की दीवारों पर जमी भाप और वो बर्फीली पकड़... अप्सरा का दम घुटने लगा था। साये की आवाज़ उसके कानों में किसी संगीत की तरह मधुर थी, पर उसमें छिपी चेतावनी मौत जैसी ठंडी थी।
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मिलते हैं अगले एपिसोड में 👋✍️


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