
Chapter 9
पिछले भाग में आपने पढ़ा,
उधर अप्सरा कॉलेज के पीछे वाले सूने गार्डन में जाकर एक बेंच पर बैठ गई और फूट-फूटकर रोने लगी। उसे लगा कि वह सुरक्षित है... पर उसे नहीं पता था कि उसके ठीक पीछे वाले पेड़ का साया धीरे-धीरे लंबा हो रहा है।
वह 'अंधेरा' उसे रोते हुए देख रहा था... और आज रात... कॉलेज की दीवारें कुछ ऐसा देखने वाली थीं, जो उन्होंने सदियों में नहीं देखा था।
अब आगे,
अप्सरा भारी क़दमों से घर की ओर बढ़ रही थी। उसका टूटा हुआ बैग, जूस से सनी नोटबुक और गले पर वो गहरा लाल निशान सब उसकी आज की हार की गवाही दे रहे थे। जैसे ही वह दरवाज़े पर पहुँची, उसके हाथ कांपने लगे। उसे डर था कि अगर चाची ने उसकी यह हालत देखी, तो आज फिर कोई नया तूफान खड़ा हो जाएगा।
उसने धीरे से दरवाज़ा खोला। अंदर का नज़ारा देखकर उसके कदम वहीं रुक गए।
सामने सोफे पर उसके चाचा (संजय जी) बैठे थे। वो दूसरी सिटी में जॉब करते थे और अक्सर महीनों बाद घर आते थे। स्वभाव से वो बिल्कुल अप्सरा के पिता जैसे थे—शांत और ममतामयी। वो अप्सरा से बहुत प्यार करते थे, लेकिन चाची मेघना के तीखे स्वभाव और दबदबे के आगे उनकी एक न चलती थी।
"अप्सरा! बेटा, तुम आ गईं?" चाचा तेज़ी से उठे और उसके पास आए। उनकी नज़र अप्सरा के बिखरे बालों और फटे हुए लॉकेट की डोरी पर पड़ी। "ये... ये क्या हालत है तुम्हारी? क्या हुआ कॉलेज में?"
अप्सरा की आँखों में आँसू आ गए। वह कुछ बोलने ही वाली थी कि तभी किचन से मेघना बाहर निकली।
अप्सरा अनजाने में एक कदम पीछे हट गई और डर के मारे अपनी आँखें बंद कर लीं। उसे लगा अब गालियों और थप्पड़ों की बौछार होगी। चाचा भी सहम गए, उन्हें लगा कि अब मेघना अप्सरा पर चिल्लाएगी कि उसने अपने कपड़े गंदे कैसे किए।
लेकिन जो हुआ, उसने सबको सुन्न कर दिया।
मेघना दौड़कर अप्सरा के पास आई। उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सी, लगभग डरावनी चिंता थी। "हाय रब्बा! मेरी बच्ची को क्या हुआ?" मेघना ने बहुत प्यार से अप्सरा का चेहरा अपने हाथों में ले लिया।
चाचा की आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में मेघना को अप्सरा के साथ इस तरह बात करते नहीं देखा था।
"देखिये न संजय, किसी ने मेरी बेटी का गला लाल कर दिया!" मेघना की आवाज़ में एक ऐसी मिठास थी जो कानों को चुभ रही थी। उसने चाचा की तरफ मुड़कर लगभग आदेश देते हुए कहा, "खड़े क्या देख रहे हैं? जल्दी से किचन से हल्दी और गरम दूध लेकर आइये। मेरी बच्ची थक गई है।"
चाचा जैसे काठ (लकड़ी) के बन गए। "मेघना... तुम... तुम ठीक तो हो न? मेरा मतलब है, तुम तो हमेशा..."
"हमेशा क्या?" मेघना ने उन्हें बीच में ही काट दिया, उसकी आँखों में एक पल के लिए वही पुरानी कड़वाहट झलकी, पर तुरंत गायब हो गई। "क्या मैं अपनी भतीजी का ख्याल भी नहीं रख सकती? जाइए और दूध लेकर आइये!"
चाचा हक्के-बक्के से किचन की तरफ भागे। उन्हें अपनी आँखों और कानों पर यकीन नहीं हो रहा था।
इधर अप्सरा पत्थर बनी खड़ी थी। मेघना ने बहुत कोमलता से अप्सरा के गले के निशान को छुआ। "किसने किया ये, बेटा? नाम बताओ उसका।"
अप्सरा ने कांपते हुए कहा, "वो... कॉलेज में... कुछ लड़के..."
मेघना के होंठों पर एक बहुत ही ठंडी और डरावनी मुस्कान आई। उसकी आँखों की पुतलियाँ एक पल के लिए काली पड़ गईं। "फिक्र मत कर... जो तुझे दर्द देता है, उसकी रातों की नींद छीन ली जाएगी।"
अप्सरा को अचानक फिर से वही बर्फीली ठंडक महसूस हुई। उसे लगा कि चाची के गले से निकलने वाली आवाज़ उनकी अपनी नहीं थी... वो आवाज़ बहुत भारी थी, जैसे कोई गहरी गुफा से बोल रहा हो।
मेघना उसे पकड़कर सोफे पर ले गई और उसे अपने हाथों से पानी पिलाया। चाचा दूध लेकर आए और दूर खड़े होकर अपनी पत्नी को देखते रहे, जैसे वो किसी अजनबी को देख रहे हों। उनके मन में बस एक ही सवाल था— 'क्या यह वही मेघना है जो इस लड़की को देखना तक पसंद नहीं करती थी? या इस घर पर किसी साये का साया पड़ गया है?'
रात बढ़ रही थी। घर में सब सो चुके थे, सिवाय अप्सरा के। वह अपने कमरे में खिड़की के पास बैठी अपना टूटा हुआ लॉकेट देख रही थी। कोई मुझसे प्यार नहीं करता। काश आप मुझे भी अपने साथ ले गए होते।
अप्सरा ने कांपते हाथों से उस टूटे हुए लॉकेट को अपने सिरहाने (Bedside table) पर रख दिया। उसकी आँखों की पलकें आँसुओं से भारी थीं, पर जैसे ही उसने बिस्तर पर सिर रखा, उसे महसूस हुआ कि कमरे की दीवारें धुंधली हो रही हैं।
एक अजीब-सी मदहोशी, एक जादुई नींद उसे अपनी गहराई में खींचने लगी। उसे अब न गले का दर्द महसूस हो रहा था, न रॉकी और तान्या की वो कड़वी बातें।
अचानक, अंधेरा छंटने लगा...
अप्सरा ने अपनी आँखें खोलीं, तो उसने खुद को अपने छोटे-से कमरे में नहीं, बल्कि एक विशाल और दिव्य जंगल के बीच पाया। यहाँ की हवा में चमेली और गीली मिट्टी की ऐसी महक थी जो रूह को सुकून दे रही थी। पेड़ों की ऊँचाई आसमान छू रही थी और पत्तों से छनकर आती सुनहरी रोशनी पूरे वातावरण को जादुई बना रही थी।
तभी उसकी नज़र कुछ दूरी पर पड़ी। वहाँ एक झरना बह रहा था, जिसका पानी चांदी की तरह चमक रहा था। झरने के पास पत्थर पर एक सुंदर सी लड़की बैठी थी। उसका चेहरा अप्सरा को नहीं दिख रहा था, लेकिन उसके खुले लंबे बाल झरने के पानी की तरह ही उसकी पीठ पर लहरों की तरह गिर रहे थे।
वह लड़की झरने के नीचे नहाने के लिए तैयार थी, उसने जैसे ही अपने पैरों को ठंडे पानी में उतारा, तभी...
अचानक दो मज़बूत और विशाल हाथों ने उसे पीछे से उसकी कमर से जकड़ लिया।
लड़की के मुँह से एक हल्की सी सिसकी निकली, पर वह डरी नहीं। उसने अपनी आँखें मूँद लीं, जैसे उसे इस स्पर्श का सदियों से इंतज़ार था। वह साया, जो उस लड़की के पीछे खड़ा था, बहुत विशाल और शक्तिशाली था। उसकी पकड़ में एक ऐसी जबरदस्ती (Possessiveness) थी, जिसे ठुकराना नामुमकिन था।
उस पुरुष ने अपनी पकड़ और भी कस ली और लड़की को पूरी तरह अपनी मज़बूत देह से सटा लिया। लड़की की कोमल पीठ उस पुरुष के चौड़े और गरम सीने को छू रही थी। अप्सरा दूर खड़ी यह सब देख रही थी, और उसे महसूस हुआ कि उसका अपना शरीर भी उसी तरह कांप रहा है, जैसे उस झरने के पास खड़ी लड़की का।
उस पुरुष ने झुककर अपना चेहरा लड़की के गले और बालों के बीच छुपा लिया। उसकी गहरी और भारी आवाज़ गूँजी, जो झरने के शोर को भी मात दे रही थी:
"कहाँ भाग रही थी? इस कायनात में ऐसी कोई जगह नहीं है... जहाँ तुम मुझसे छिप सको।"
उसने अपनी एक हथेली लड़की के पेट पर रखी और दूसरी से उसके चेहरे को पीछे की तरफ घुमाया। उन दोनों के बीच की दूरी अब खत्म हो चुकी थी। उस पुरुष की साँसें उस लड़की की गर्दन पर आग की तरह महसूस हो रही थीं।
लड़की ने कांपते हुए हाथ पीछे ले जाकर उस पुरुष के बालों में डाल दिए। "मैंने छिपने की कोशिश नहीं की... मैं तो बस आपके आने का इंतज़ार कर रही थी," लड़की ने बहुत ही मदहोश कर देने वाली आवाज़ में कहा।
उस पुरुष के होंठों पर एक गहरी और जानलेवा मुस्कान आई। उसने बहुत ही तीव्रता (Intensity) के साथ लड़की के कंधे से उसके वस्त्र को थोड़ा सरकाया और वहाँ अपने अधिकार की मुहर लगा दी। उसका स्पर्श डरावना नहीं था, बल्कि उसमें एक ऐसा जुनून था जो रूह को जला दे।
उस पुरुष ने लड़की को अपनी विशाल बाहों में उठाया और झरने की उस सफेद धुंध के बीच ले गया। जैसे ही वे पानी की बौछार के नीचे पहुँचे, वह लड़की अचानक पलटी और पहली बार उसका चेहरा अप्सरा को दिखा। अप्सरा की सांसें थम गईं वह चेहरा बिल्कुल उसका अपना ही था।
उस पुरुष ने अपनी मज़बूत पकड़ उसकी कमर पर और भी सख़्त कर दी। उसकी आँखों में एक ऐसी दहकती हुई प्यास थी जो रूह को जला दे। उसने अप्सरा के चेहरे के करीब झुककर, अपनी भारी और गूँजती हुई आवाज़ में कहा:
"तुम मेरी इबादत हो, मेरी इकलौती प्यास... और तुम्हें पीने का हक सिर्फ मेरा है... सिर्फ मेरा!"
यह कहते ही उसने अपना अधिकार जताते हुए उसके गले और कंधे के जोड़ पर अपनी मुहर लगा दी।
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मिलते हैं अगले एपिसोड में 👋


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