
पिछले भाग में आपने पढ़ा,
कॉलेज की बस आई तो अप्सरा ने चढ़ते हुए पीछे मुड़कर देखा। माधुरी वहीं खड़ी थी, हाथ हिलाते हुए। बस आगे बढ़ गई। खिड़की से बाहर देखती हुई अप्सरा सोचने लगी यह सिर्फ़ कॉलेज का सफ़र नहीं है। यह उसके जीवन का पहला कदम है, जहाँ शायद वह सिर्फ़ किसी की भतीजी या काम करने वाली लड़की नहीं, बल्कि खुद “अप्सरा” बन पाएगी।
बस शहर की भीड़ में गुम हो गई, और अप्सरा के भीतर कहीं एक नई कहानी चुपचाप आकार लेने लगी।
अब आगे,
अप्सरा अपनी नोटबुक को सीने से चिपकाए क्लास से बाहर निकली। उसका दिमाग सुन्न था। वो विहान के साथ हुए हादसे और उस नोटबुक पर लिखे शब्दों के बीच उलझी हुई थी। तभी कॉरिडोर के शोर ने उसका ध्यान खींचा।
"ओह माय गॉड! ये क्या पहनकर आ गई है?" एक तीखी और नखरे भरी आवाज़ आई।
अप्सरा ने सर उठाकर देखा। सामने तीन-चार लड़कियों का एक ग्रुप था, जिसकी लीडर तान्या थी। शहर के सबसे बड़े बिज़नेस मैन की बेटी, जिसके पैर ज़मीन पर कम और घमंड पर ज़्यादा टिकते थे। उसके पास खड़ा था रॉकी—कॉलेज का मशहूर आवारा लड़का, जिसके लिए लड़कियों को परेशान करना एक खेल था।
तान्या ने अपनी महंगी हील्स की आवाज़ करते हुए अप्सरा का रास्ता रोका। उसने ऊपर से नीचे तक अप्सरा के सादे सूट और चोटी को देखा। "ये कॉलेज है या कोई सत्संग? बहन जी, रास्ता भूल गई हो क्या?"
तान्या के पीछे खड़े लड़के-लड़कियां ठहाका मार कर हँस पड़े। अप्सरा का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसने अपनी नज़रें झुका लीं और चुपचाप बगल से निकलने की कोशिश की।
पर रॉकी ने अपना हाथ दीवार पर टिकाकर उसका रास्ता रोक लिया। "अरे, ऐसे कैसे जा रही हो? इंट्रोडक्शन तो देती जाओ। मैंने सुना है गाँव की लड़कियां बहुत 'सेवा' करती हैं।" रॉकी ने अपनी गंदी मुस्कान के साथ अप्सरा के चेहरे की तरफ अपना हाथ बढ़ाया।
अप्सरा की सांसें अटक गईं। उसे फिर से वही बर्फ जैसी ठंडक महसूस होने लगी।
तभी...
"क्या हो रहा है यहाँ?" एक भारी और सख़्त आवाज़ गूँजी।
सब पीछे मुड़े। वो प्रोफेसर वर्धन थे। कॉलेज के सबसे सख्त प्रोफेसर, जिनकी आँखों के पीछे एक अजीब सा राज छुपा रहता था। "क्लास का समय हो गया है। रॉकी, तान्या... अपनी-अपनी क्लास में जाओ।"
तान्या ने पैर पटकते हुए अप्सरा को एक आखिरी 'जलन भरी' नज़र दी और चली गई। रॉकी ने जाते-जाते फुसफुसाया, "अभी तो पार्टी शुरू हुई है, चश्मिश।"
प्रोफेसर वर्धन अप्सरा के पास आए। उनकी नज़रें अप्सरा के गले में लटके लॉकेट पर टिकी थीं। "तुम... ठीक हो?" उन्होंने धीमे से पूछा, पर उनकी आवाज़ में एक अजीब सी चिंता थी, जैसे वो अप्सरा को नहीं, बल्कि उसके पीछे खड़े किसी 'साये' को देख रहे हों।
लंच ब्रेक की बेल बजी, तो अप्सरा को लगा जैसे उसे सांस लेने का मौका मिला हो। सुबह से जो अजीब घटनाएं उसके साथ हो रही थीं, उन्होंने उसे अंदर तक थका दिया था। पेट में भूख की लहर उठी, तो उसे याद आया कि उसने सुबह से बस वो एक निवाला खाया था जो चाची ने खिलाया था।
वो डरते-डरते कैंटीन पहुँची। वहाँ लड़के-लड़कियों का सैलाब था। मेज़ों पर रखे खाने की महक और शोर-शराबा... अप्सरा के लिए ये सब बिल्कुल नया था। वो चुपचाप एक कोने की खाली मेज़ पर जाकर बैठ गई। उसने अपने बैग से अपनी पुरानी नोटबुक निकाली—वही जिसमें उसने पिछले तीन सालों के सारे नोट्स बड़ी मेहनत से लिखे थे।
वो बस अपनी नोटबुक देख ही रही थी कि तभी मेज़ पर एक साया पड़ा।
"ओह! देखो तो... बेचारी अकेली बैठी है।" तान्या की आवाज़ किसी चाबुक की तरह गूँजी।
तान्या के हाथ में संतरे का जूस था। उसने अपनी महँगी सनग्लासेस बालों पर सरकाए और अप्सरा की नोटबुक को घृणा से देखा। उसके पीछे रॉकी और उसके दो-तीन दोस्त खड़े होकर मज़े ले रहे थे।
"क्या पढ़ रही हो बहन जी? वैसे ये नोटबुक है या रद्दी का ढेर?" तान्या ने हँसते हुए कहा और बिना रुके अपने हाथ का गिलास तिरछा कर दिया।
छपाक!
गाढ़ा, चिपचिपा संतरे का जूस सीधा अप्सरा की नोटबुक के पन्नों पर गिरा। नीली स्याही फैलने लगी... शब्द धुंधले होने लगे। अप्सरा की आँखें फटी की फटी रह गई। उसकी तीन साल की मेहनत उसकी आँखों के सामने गीली होकर गल रही थी।
"अरे... सॉरी! मेरा हाथ फिसल गया," तान्या ने बनावटी दुख दिखाते हुए कहा, पर उसकी आँखों में साफ़ चमक थी। "वैसे भी ये कचरा साफ़ होना ही चाहिए था।"
अप्सरा के होंठ कांपने लगे। उसने कांपते हाथों से अपनी नोटबुक उठानी चाही, पर रॉकी ने आगे बढ़कर उसका बैग मेज़ से नीचे गिरा दिया। बैग से पेन, पुरानी पेंसिलें और एक छोटा सा टिफिन बॉक्स निकलकर दूर जा गिरे।
"अरे रॉकी, देख... ये लोग अभी भी ऐसे स्टील के डब्बे यूज़ करते हैं?" रॉकी का दोस्त हँसा।
रॉकी ने अप्सरा के पास झुककर बहुत धीमी और डरावनी आवाज़ में कहा, "सुन... यहाँ ये सब ड्रामा नहीं चलेगा। तान्या का मूड खराब कर दिया तूने। चल, नीचे झुक... अपना बैग उठा और तान्या से हाथ जोड़कर माफ़ी मांग।"
पूरी कैंटीन में सन्नाटा छा गया था। लोग अपनी जगहों पर खड़े होकर देख रहे थे। कुछ लड़के अपने फोन से वीडियो बना रहे थे, कुछ हँस रहे थे। पर कोई भी उस अकेली लड़की के लिए आगे नहीं आया।
अप्सरा ने चारों तरफ देखा। उसे लगा जैसे वो फिर से उसी जंगल में है, जहाँ चार दरिंदों ने उसे घेर लिया था। उसकी आँखों से एक गरम आँसू नोटबुक के गीले पन्ने पर गिरा।
"मैं... मैं क्यों माफ़ी माँगूँ?" अप्सरा ने बहुत धीमी आवाज़ में अपनी पूरी हिम्मत जुटाकर कहा।
रॉकी की मुस्कान अचानक गायब हो गई। उसने मेज़ पर जोर से मुक्का मारा, जिससे बर्तन खनखना उठे। "ज़बान लड़ती है? नीचे झुक!"
तान्या ने जूस से भीगी हुई अपनी उंगली अप्सरा के कंधे पर पोंछ दी। "रॉकी, शायद ये ऐसे नहीं मानेगी। इसका ये फटा-पुराना बैग उठाओ और कैंटीन के बाहर कचरे के ढेर में फेंक दो।"
अप्सरा के चेहरे पर खौफ उतर आया। "नहीं... प्लीज़... मेरा बैग दे दो..." वो रोते हुए नीचे झुकी ताकि अपना सामान समेट सके। उसके हाथ कांप रहे थे, मिट्टी और जूस में सने उसके सामान को देख उसे अपनी गरीबी और अपनी बेबसी पर रोना आ रहा था।
जब वो नीचे झुकी थी, उसे महसूस नहीं हुआ... पर पूरी कैंटीन का तापमान अचानक एक डिग्री गिर गया। खिड़की के पास खड़े एक लड़के को महसूस हुआ कि उसे अचानक ठंड लग रही है, जबकि बाहर धूप तेज़ थी।
अप्सरा ने ज़मीन पर पड़ा अपना लॉकेट देखा, जो बैग से गिर गया था। जैसे ही उसने लॉकेट को छुआ, उसे लगा जैसे कोई बिजली की लहर उसके हाथ से होकर उसके सीने तक गई हो। एक पल के लिए... सिर्फ एक पल के लिए, उसे कैंटीन का शोर सुनाई देना बंद हो गया। उसे बस एक भारी धड़कन सुनाई दी— धक-धक...
"उठा इसे!" रॉकी ने उसके बैग पर पैर रख दिया।
अप्सरा ने ऊपर देखा। उसकी आँखों में अब सिर्फ डर नहीं था... एक अजीब सी शून्यता थी।
कैंटीन का शोर अप्सरा के कानों में चुभ रहा था। उसकी आँखों के सामने उसकी बरसों की मेहनत, वो नोटबुक, संतरे के जूस में भीगकर दम तोड़ रही थी। पर तान्या और रॉकी का मन अभी भरा नहीं था।
तान्या ने तिरछी नज़रों से रोती हुई अप्सरा को देखा और फिर उसकी नज़र अप्सरा के गले में चमकती उस बारीक सी डोरी पर पड़ी।
"ओह! तो मैडम के पास जेवर भी हैं?" तान्या ने खिलखिलाते हुए कहा और झपट्टे से अप्सरा के करीब आई। "देखूँ तो ज़रा, इस 'अप्सरा' ने कौन सा कीमती हार पहना है।"
"नहीं... प्लीज... इसे मत छुओ!" अप्सरा घबराकर पीछे हटी, उसने दोनों हाथों से अपने गले को ढंकने की कोशिश की। वो लॉकेट सिर्फ पीतल का एक टुकड़ा नहीं था, वो उसके मरे हुए माँ-बाप की आखिरी धड़कन थी।
पर तान्या के इरादे पत्थर जैसे थे। उसने बेरहमी से अप्सरा के हाथों को झटक दिया और उसके गले से वो डोरी खींच ली।
चटाक!
कमज़ोर डोरी झटके से टूट गई। अप्सरा के गले पर एक लाल लकीर उभर आई। तान्या ने लॉकेट को अपनी उंगलियों में घुमाते हुए उसे गौर से देखा और फिर नफरत से अपना मुँह बनाया। "छी! ये घटिया सा पीतल का टुकड़ा? ये तो किसी कबाड़ की दुकान पर भी नहीं बिकेगा।"
"वापस दे दो... प्लीज... वो मेरी माँ का है..." अप्सरा हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगी।
"तुम्हारी माँ का है? तो फिर इसे वहीं होना चाहिए जहाँ तुम्हारी किस्मत है... कचरे में!" तान्या ने हाथ हवा में लहराया और पूरी ताकत से लॉकेट को दूर फर्श पर फेंक दिया। लॉकेट फिसलता हुआ सीधे उसी जगह गिरा जहाँ जूस और गंदगी फैली हुई थी।
पूरी कैंटीन ठहाकों से गूँज उठी। रॉकी और उसके दोस्त मेज़ थपथपाकर हँसने लगे। "बेचारी अप्सरा! अब जा, अपने कीचड़ से अपना खजाना निकाल!" रॉकी ने ताली बजाते हुए कहा।
अप्सरा कांपते हुए घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गई। वो गंदे फर्श पर रेंगते हुए अपने लॉकेट तक पहुँचने की कोशिश कर रही थी। चारों तरफ से आती हँसी उसे किसी तीखे तीर की तरह चुभ रही थी। उसकी सिसकियाँ गले में ही घुट रही थीं।
तभी...
कैंटीन का तापमान अचानक इतना गिर गया कि लोगों के मुँह से निकलने वाली भाप दिखने लगी। जो लोग हँस रहे थे, उनके गले में हँसी जैसे जम सी गई।
"क्या हो रहा है यहाँ?!" एक कड़क और रौबदार आवाज़ गूँजी।
सबकी नज़रें कैंटीन के दरवाज़े की तरफ मुड़ीं। वहाँ प्रोफेसर गायत्री खड़ी थीं। वो कॉलेज की सबसे सीनियर और गंभीर प्रोफेसर थीं। उनकी तीखी नज़रें सीधा तान्या और रॉकी पर टिकी थीं।
प्रोफेसर गायत्री तेज़ी से आगे बढ़ीं। भीड़ खुद-ब-खुद रास्ता देने लगी। उन्होंने ज़मीन पर बेबस पड़ी अप्सरा को देखा, जो गंदे जूस के बीच अपना लॉकेट ढूँढ रही थी। प्रोफेसर का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा।
"तान्या! रॉकी! तुम लोगों को शर्म नहीं आती? ये कॉलेज है या कोई अखाड़ा?" गायत्री ने चिल्लाकर कहा।
तान्या ने अपने बाल झटके और मासूम बनने का नाटक करते हुए बोली, "मैम, हम तो बस मज़ाक कर रहे थे। ये खुद ही गिर गई..."
"चुप रहो!" गायत्री ने उसे बीच में ही टोक दिया। उन्होंने झुककर अप्सरा का हाथ थामा और उसे खड़ा किया। उन्होंने देखा कि अप्सरा के गले पर लॉकेट खिंचने का गहरा निशान पड़ गया है और उसकी आँखों में जो दर्द है, वो किसी को भी अंदर तक हिला दे।
गायत्री ने खुद झुककर कीचड़ से वो लॉकेट उठाया और अपने रुमाल से साफ़ करके अप्सरा की हथेली पर रख दिया। "अपने रूम में जाओ, अप्सरा। और तुम दोनों..." उन्होंने तान्या और रॉकी की तरफ मुड़कर देखा, "कल सुबह तुम दोनों के पेरेंट्स प्रिंसिपल के ऑफिस में होने चाहिए। वरना ये तुम्हारा कॉलेज में आखिरी दिन होगा।"
तान्या ने पैर पटकते हुए वहाँ से निकलना बेहतर समझा, रॉकी भी बुदबुदाते हुए चला गया। भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी।
अप्सरा ने कांपते हाथों से अपना लॉकेट अपनी मुट्ठी में भींच लिया। उसने प्रोफेसर गायत्री को एक धीमी सी 'थैंक्यू' कही और अपना टूटा हुआ बैग लेकर वहाँ से भाग खड़ी हुई।
वह नहीं देख पाई... लेकिन जैसे ही वह कैंटीन से बाहर निकली, प्रोफेसर गायत्री की नज़रें फर्श पर पड़े उस जूस की तरफ गईं। जूस की वो बूंदें जो नोटबुक पर गिरी थीं, वो अब सूख चुकी थीं... और ताज्जुब की बात ये थी कि कीचड़ वाली जगह पर किसी के पैर के विशाल निशान बने हुए थे।
ऐसे निशान, जो किसी इंसान के नहीं हो सकते थे।
गायत्री का दिल ज़ोर से धड़का। उन्होंने अपनी ऐनक ठीक की और फिर से देखा, पर निशान गायब हो चुके थे। हवा में बस एक हल्की सी फुसफुसाहट रह गई थी, जो सिर्फ उस इंसान को सुनाई दे सकती थी जिसने कभी 'अनहोनी' को महसूस किया हो।
उधर अप्सरा कॉलेज के पीछे वाले सूने गार्डन में जाकर एक बेंच पर बैठ गई और फूट-फूटकर रोने लगी। उसे लगा कि वह सुरक्षित है... पर उसे नहीं पता था कि उसके ठीक पीछे वाले पेड़ का साया धीरे-धीरे लंबा हो रहा है।
वह 'अंधेरा' उसे रोते हुए देख रहा था... और आज रात... कॉलेज की दीवारें कुछ ऐसा देखने वाली थीं, जो उन्होंने सदियों में नहीं देखा था।
मिलते हैं अगले एपिसोड में 👋


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