
Chapter 7
पिछले भाग में आपने पढ़ा,
कॉलेज की बस आई तो अप्सरा ने चढ़ते हुए पीछे मुड़कर देखा। माधुरी वहीं खड़ी थी, हाथ हिलाते हुए। बस आगे बढ़ गई। खिड़की से बाहर देखती हुई अप्सरा सोचने लगी यह सिर्फ़ कॉलेज का सफ़र नहीं है। यह उसके जीवन का पहला कदम है, जहाँ शायद वह सिर्फ़ किसी की भतीजी या काम करने वाली लड़की नहीं, बल्कि खुद “अप्सरा” बन पाएगी।
बस शहर की भीड़ में गुम हो गई, और अप्सरा के भीतर कहीं एक नई कहानी चुपचाप आकार लेने लगी।
अब आगे,
कॉलेज का विशाल लोहे का गेट अप्सरा के सामने खड़ा था। उसने अपनी आँखों को एक बार जोर से मींचा और फिर धीरे से खोला, जैसे उसे डर हो कि पलक झपकते ही यह सब गायब हो जाएगा और वह फिर से अपनी चाची के घर की उसी अंधेरी रसोई में होगी जहाँ बर्तनों का शोर और गालियों की गूँज उसका पीछा करती थी।
लेकिन नहीं... सामने सच में 'सिटी कॉलेज' का बोर्ड चमक रहा था।
अप्सरा ने अपने कंधे पर लटके बैग के फीते को कसकर पकड़ा। यह सिर्फ एक बैग नहीं था, इसमें उसकी वो बरसों की तड़प बंद थी जिसे उसने अकेले कमरे में बैठकर जिया था। उसे याद आया कि कैसे उसने अपनी स्कूल की पढ़ाई और फिर डिस्टेंस लर्निंग (Distance Learning) के एग्जाम रो-रोकर पूरे किए थे। उसे याद था वो दिन जब उसने चाची के सामने हाथ जोड़कर कॉलेज जाने की भीख माँगी थी, और जवाब में मेघना ने उसकी किताबें फेंक दी थीं।
"पढ़-लिखकर क्या कलेक्टर बनेगी? यहाँ रह और घर संभाल, यही तेरी किस्मत है!"
चाची के वो शब्द आज भी उसके कानों में गरम सीसे की तरह उतरते थे। लेकिन आज? आज उसी मेघना ने अपने हाथों से उसे दही-चीनी खिलाकर विदा किया था।
अप्सरा के कदम धीरे-धीरे अंदर की ओर बढ़े। जैसे ही उसने गेट के अंदर पहला कदम रखा, उसे लगा जैसे उसने अपनी पुरानी घुटन भरी ज़िंदगी को पीछे छोड़ दिया हो। कैंपस के अंदर लड़के-लड़कियों का शोर, ठहाके, और हाथों में किताबें लिए भागते हुए छात्र—यह सब उसके लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं था।
वह एक बड़े से पीपल के पेड़ के नीचे रुक गई। ठंडी हवा चली और उसके चेहरे को छूकर गुजरी। उसकी आँखों के कोने से एक आँसू चुपके से ढलका और मिट्टी में समा गया।
"महादेव... क्या ये सच है?" उसने मन ही मन फुसफुसाया। "क्या सच में मुझे एक आम लड़की की तरह जीने का हक मिल गया?"
उसने अपने गले में लटके उस लॉकेट को छुआ। जैसे ही उसकी उंगलियाँ लॉकेट से टकराईं, उसे वही पुरानी हल्की सी झुनझुनी महसूस हुई। उसे याद आया कि यह सब उस रात के बाद ही शुरू हुआ है। वो गुफा... वो मूर्ति... और वो आवाज़।
अचानक उसे महसूस हुआ कि भले ही वह इस भीड़ में अकेली खड़ी है, लेकिन कोई है जो उसे देख रहा है। कोई है जो उसके इस सपने के सच होने पर उसके साथ खड़ा है। हवा में एक बहुत हल्की सी खुशबू तैरी—पुरानी राख और जंगली फूलों की महक।
उसे महसूस हुआ कि उसके कंधे पर एक अदृश्य, भारी लेकिन बहुत कोमल हाथ रखा गया है। जैसे कोई कह रहा हो— "ये तो बस शुरुआत है, अप्सरा। अब दुनिया तुम्हारे कदमों में होगी।"
अप्सरा के होंठों पर एक ऐसी मुस्कान आई जो पिछले 12 सालों में किसी ने नहीं देखी थी। वह डरपोक, सहमी हुई लड़की आज पहली बार खुद को 'अप्सरा' महसूस कर रही थी।
उसने गहरी सांस ली, अपने आँसू पोंछे और सीधे सिर उठाकर अपनी पहली क्लास की तरफ बढ़ गई। उसे नहीं पता था कि यह कॉलेज उसके लिए सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि उस 'दैत्य' के प्रेम और उसकी सुरक्षा का सबसे बड़ा गवाह बनने वाला है।
क्लास के दरवाज़े पर पहुँचकर अप्सरा एक पल के लिए रुकी। अंदर स्टूडेंट्स का शोर था, कोई हँस रहा था तो कोई ग्रुप में बातें कर रहा था। अप्सरा ने अपनी नज़रें झुकाईं और चुपचाप सबसे पीछे वाली बेंच के कोने में जाकर बैठ गई। उसने अपनी नोटबुक मेज़ पर रखी और उसे बहुत प्यार से सहलाया। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जिस कॉलेज के सपने उसने बंद आँखों से देखे थे, आज वो सच में उसी की एक बेंच पर बैठी है।
तभी उसकी बेंच के पास कुछ कदम रुके।
"एक्सक्यूज मी? क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?" एक लड़के की आवाज़ आई।
अप्सरा ने चौंककर ऊपर देखा। सामने एक लंबा, मुस्कराता हुआ लड़का खड़ा था। विहान नाम था उसका, जैसा कि उसने बाद में बताया। अप्सरा की सांसें अचानक तेज़ हो गईं। बरसों से सिर्फ डाँट और तन्हाई झेलने वाली लड़की के लिए किसी अजनबी का इस तरह पास आना घबराहट पैदा कर रहा था।
उसने धीरे से सर हिलाया और खिड़की की तरफ खिसक गई। विहान उसके बगल में बैठ गया। "हाय, मैं विहान। तुम पहली बार आई हो क्या? पहले कभी देखा नहीं तुम्हें यहाँ।"
अप्सरा के होंठ कांपे, "जी... अप्सरा।"
विहान ने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा, "नाम तो बहुत खूबसूरत है, बिल्कुल तुम्हारी तरह।"
विहान की नज़रों में एक किस्म की तारीफ थी, जो शायद किसी भी लड़की को अच्छी लगती, लेकिन अप्सरा को अचानक अपने आस-पास की हवा बदलती हुई महसूस हुई। खिड़की के बाहर चिलचिलाती धूप थी, पर क्लास का वो कोना अचानक इतना ठंडा हो गया जैसे किसी ने वहाँ बर्फ की दीवार खड़ी कर दी हो। अप्सरा को महसूस हुआ कि उसकी रीढ़ की हड्डी में एक ठंडी लहर दौड़ गई है।
विहान ने जैसे ही अपना हाथ मेज़ पर रखा और बातों-बातों में उसका हाथ अनजाने में अप्सरा की कोहनी की तरफ बढ़ा, तभी...
तड़तड़...!
क्लास की एक ट्यूबलाइट अचानक भभक कर बुझ गई। क्लास में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। विहान का हाथ वहीं हवा में रुक गया। उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसे छुआ नहीं, बल्कि उसकी कलाई को किसी अदृश्य बर्फ की जंजीर से जकड़ दिया हो। विहान का चेहरा अचानक दर्द से पीला पड़ गया।
"आह...!" उसने झटके से अपना हाथ पीछे खींच लिया, जैसे उसे बिजली का झटका लगा हो।
"क्या हुआ?" अप्सरा ने घबराकर पूछा। उसकी खुद की आवाज़ डर से कांप रही थी।
विहान अपनी कलाई सहलाते हुए खड़ा हो गया। उसके माथे पर अचानक पसीना आ गया था। "पता नहीं... अचानक ऐसा लगा जैसे किसी ने... किसी ने मेरी कलाई तोड़ दी हो।" उसने डरते हुए उस खाली कोने की तरफ देखा जहाँ अप्सरा बैठी थी। उसे महसूस हुआ कि उस अंधेरे से कोई उसे घूर रहा है—एक ऐसी नज़र जो उसे वहाँ से तुरंत भाग जाने का हुक्म दे रही थी।
विहान बिना कुछ और कहे, लड़खड़ाते कदमों से दूसरी बेंच पर जाकर बैठ गया।
क्लास फिर से सामान्य हो गई। लाइट वापस जल उठी। अप्सरा हक्की-बक्की थी, उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हुआ। उसे लगा शायद ये उसका वहम है। लेकिन तभी... उसकी नोटबुक के बिल्कुल कोरे पन्ने पर, काली स्याही से अपने आप कुछ उभरने लगा।
जैसे कोई कलम नहीं, बल्कि खुद कागज़ ही वो शब्द उगल रहा हो—
"तुम सिर्फ मेरी हो। तुम्हें कोई और नहीं छुएगा।"
अप्सरा की चीख गले में ही दब गई। उसने झटके से अपनी नोटबुक बंद कर दी। उसका दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे डर था कहीं क्लास में सबको सुनाई न दे जाए। उसने घबराकर अपने गले के लॉकेट को पकड़ा। लॉकेट हाथ लगाने पर इतना ठंडा था कि अप्सरा की उंगलियाँ सुन्न पड़ गईं।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा है। क्या वो पागल हो रही है? या उस रात गुफा में उसके साथ कुछ ऐसा जुड़ गया है जो अब उसका पीछा नहीं छोड़ रहा?
वह कॉलेज तो आ गई थी, लेकिन उसे अब अहसास हो रहा था कि वह यहाँ अकेली नहीं है। कोई है जो साये की तरह उसके साथ चल रहा है... कोई जो अदृश्य है, लेकिन बहुत ही खतरनाक।
मिलते हैं अगले एपिसोड में 👋


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