
पिछले भाग में आपने पढ़ा,
उसने कांपते हुए अपने गले का लॉकेट पकड़ा…
और आँखें बंद कर लीं।
फिर बहुत धीमे से…
बिल्कुल टूटी हुई आवाज़ में फुसफुसाई—
“ये सब… सपना है क्या महादेव…?”
“यकीन नहीं हो रहा मुझे तो…”
और उसके होंठों से एक छोटी-सी सिसकी निकल गई…
लेकिन इस बार वो सिसकी दुख की नहीं थी…
ये उस इंसान की थी
जिसे पहली बार
थोड़ा सा प्यार मिला हो… 🥺✨
अब आगे,
तभी उसकी पलकों पर एक अजीब-सा भारीपन उतरने लगा…
जैसे नींद नहीं… कोई जादू धीरे-धीरे उसे अपनी तरफ खींच रहा हो।
अप्सरा ने लॉकेट को अपने हाथ में कसकर पकड़ा।
उसकी सांसें धीमी होने लगीं…
दिल की धड़कन भी जैसे शांत होने लगी।
और फिर…
उसे महसूस हुआ…
जैसे वो अपने बिस्तर पर नहीं है।
जैसे कोई उसे थामे हुए है…
बहुत पास… बहुत सुरक्षित।
मानो वो किसी की बाहों में सो रही हो।
उसकी देह को एक गर्माहट ने घेर लिया…
ऐसी गर्माहट जो घर की नहीं थी…
किसी इंसान की भी नहीं…
फिर भी…
उसमें डर नहीं था।
बस एक अजीब-सा सुकून था।
जैसे पहली बार…
उसे सच में आराम मिल रहा हो।
अप्सरा की आँखें पूरी तरह बंद हो गईं।
और नींद की गहराई में जाते-जाते
उसके कानों में एक बहुत धीमी-सी फुसफुसाहट उतरी…
“अब… मैं हूँ।” 😈✨
अप्सरा की पलकों के पीछे अंधेरा था…
लेकिन उस अंधेरे में भी उसे एक एहसास साफ़ महसूस हुआ।
उसके माथे पर…
किसी का स्पर्श आया।
बहुत हल्का…
बहुत धीमा…
जैसे कोई हवा नहीं…
दुआ छू गई हो।
फिर…
उसे अपने माथे पर एक चुंबन महसूस हुआ।
उसका दिल एक पल को तेज़ धड़क उठा।
सांस जैसे रुक गई।
लेकिन उसकी आंखें बंद थीं।
वो उन्हें खोल नहीं पाई…
या शायद…
खोलना ही नहीं चाहती थी।
क्योंकि उस स्पर्श में कोई डर नहीं था।
ना कोई मजबूरी…
ना कोई दर्द…
बस एक अजीब-सा अपनापन था।
जैसे किसी ने बिना कहे कह दिया हो—
“तुम सुरक्षित हो…”
अप्सरा की उंगलियाँ धीरे से लॉकेट पर कस गईं…
और उसके होंठों पर अनजाने में एक हल्की-सी मुस्कान आ गई।
फिर वो उसी एहसास के साथ
और गहरी नींद में उतरती चली गई… 🌙✨
सुबह की रोशनी अब पूरी तरह फैल चुकी थी।
अप्सरा की आँखें धीरे-धीरे खुलीं…
और इस बार वो डरकर नहीं उठी।
उसने अपने माथे को छुआ…
वो अजीब-सा एहसास अभी भी वहाँ था।
जैसे कोई स्पर्श… कोई चुंबन…
जो सपना नहीं लगता था।
वो झट से उठ बैठी।
कमरे में सब सामान्य था…
लेकिन उसके अंदर कुछ बदल चुका था।
उसने गले में लॉकेट को पकड़ा।
वो वहीं था।
सही सलामत।
अप्सरा ने राहत की सांस ली…
और धीरे से खुद से बोली—
“आज कॉलेज जाना है…”
कुछ देर में वो तैयार होने लगी।
सादा सा सूट… बालों की एक चोटी…
और चेहरे पर वो मासूमियत
जिसे ज़िंदगी ने बहुत जल्दी थका दिया था।
जैसे ही वो कमरे से बाहर निकली…
उसे फिर वही बात चौंका गई।
घर में कोई चिल्लाहट नहीं थी।
कोई ताना नहीं।
कोई “जल्दी कर” नहीं।
किचन से हल्की-हल्की खुशबू आ रही थी…
और मेघना की आवाज़ आई—
“अप्सरा… आ जा बेटा, नाश्ता कर ले।”
अप्सरा वहीं ठिठक गई।
उसके कदम जैसे जमीन पर जम गए।
“नाश्ता…?”
जैसे ही अप्सरा की चाची ने उसे नाश्ता करने के लिए कहा,
अप्सरा को अपने कानों पर भरोसा ही नहीं हुआ।
क्योंकि जब से वह इस घर में आई थी,
तब से नाश्ता क्या…
घर का हर काम उसी के हिस्से आया था।
उसने आज तक अपनी चाची को रसोई में काम करते नहीं देखा था।
पर आज…
आज कुछ बदला-बदला सा लग रहा था।
“हे महादेव…
ये कहीं सपना तो नहीं?”
अप्सरा ने मन ही मन सोचा।
अगले ही पल
उसने अपने हाथ पर हल्की-सी चुटकी काट ली।
दर्द हुआ।
वह मुस्कुरा दी।
“नहीं… ये सपना नहीं है।”
तभी मेघना ने उसका हाथ थाम लिया
और बिना कोई सवाल किए
उसे नाश्ते की टेबल पर बैठा दिया।
अप्सरा अपनी सोच से बाहर आई
और पहली बार
किसी और के लिए खाना बनते हुए देखने लगी।
मेघना किचन में चली गई।
उसी पल
अप्सरा की नज़र
घर के मेन गेट पर पड़ी।
वहाँ से
दो आँखें
घर के अंदर झाँक रही थीं।
एक पल के लिए
उसका दिल बैठ सा गया।
“कहीं… कोई चोर तो नहीं?”
😟
वह धीरे-धीरे
गेट की ओर बढ़ी।
पर जैसे ही
उसने गेट के पास खड़ी लड़की को देखा,
उसकी साँस में साँस आई।
“कितनी बार कहा है
अंदर ऐसे मत झाँका कर,”
अप्सरा ने झुँझलाकर कहा।
“मैं डर गई थी।”
लड़की ने मुँह बनाया।
“क्या करूँ?”
“और कोई ऑप्शन भी तो नहीं है।”
“अगर तेरी वो चांडाल चाची मुझे देख ले ना,
तो तुझे और सुनाएगी।”
“इसलिए अंदर नहीं आती।”
तभी पीछे से आवाज़ आई—
“माधुरी…
घर के बाहर क्यों खड़ी हो बेटा?
अंदर आओ।”
आवाज़ सुनते ही
अप्सरा और माधुरी
दोनों चौंक गईं।
माधुरी का तो
मुँह ही खुला का खुला रह गया।
यह लड़की थी माधुरी—
अप्सरा की
एकमात्र दोस्त।
माधुरी धीरे-धीरे घर के अंदर आई। उसके कदमों में झिझक थी, जैसे ज़मीन अचानक भरोसेमंद न रह गई हो। मेघना की आवाज़ इस बार अजीब-सी मिठास लिए थी, “आ जाओ।” माधुरी ने एक पल के लिए अप्सरा की तरफ देखा। अप्सरा की आँखों में वही सवाल था जो उसके मन में भी उठ रहा था—आज ये सब क्या हो रहा है?
नाश्ते की टेबल पर पहले से प्लेट लगी हुई थी। सलीके से रखा हुआ खाना, साफ़ मेज़पोश, और घर में फैली हुई एक अनजानी शांति। अप्सरा ने प्लेट को देखा, फिर मेघना को। इस घर में ऐसा दृश्य उसने पहले कभी नहीं देखा था। “खड़ी क्यों हो?” मेघना ने कहा, “बैठो, ठंडा हो जाएगा।” अप्सरा बैठ तो गई, लेकिन उसके हाथ अपने आप प्लेट की ओर नहीं बढ़े।
माधुरी ने बहुत धीमे से पूछा, “आज कोई पूजा-वूजा है क्या?” अप्सरा ने हल्का-सा सिर हिला दिया—न हाँ, न ना। किचन से मेघना की आवाज़ फिर आई, “आज कॉलेज का पहला दिन है ना, इसलिए सोचा बच्ची भूखी जाएगी तो अच्छा नहीं लगेगा।” ‘बच्ची’… यह शब्द अप्सरा के कानों में अटक गया। इतने सालों में उसने इस घर में अपने लिए यह शब्द कभी नहीं सुना था।
उसने पहला कौर मुँह में रखा। खाना स्वादिष्ट था—हद से ज़्यादा। और यही बात उसे भीतर से डराने लगी। तभी मेघना सामने वाली कुर्सी पर आकर बैठ गई। “अप्सरा,” उसने ऐसे पुकारा जैसे नाम को तौल रही हो। “कॉलेज में ध्यान से रहना। आजकल की दुनिया ठीक नहीं है। लड़कियों को ज़्यादा समझदार होना पड़ता है।”
माधुरी से रहा नहीं गया। उसने तुरंत कहा, “वो समझदार है, चाची।” मेघना ने एक पल के लिए माधुरी को देखा। उसकी मुस्कान बनी रही, लेकिन आँखों में कुछ और ही था। “हाँ… दिख तो रही है,” उसने कहा, “बस सही संगत में रहे।”
अप्सरा का दिल अचानक भारी हो गया। पहली बार उसे यह समझ आया कि यह नाश्ता प्यार नहीं था। यह किसी फैसले की शुरुआत थी। क्योंकि जब किसी घर में बिना वजह सब कुछ अच्छा लगने लगे, तो अक्सर उसके पीछे कोई न कोई मंशा छुपी होती है।
बाहर हवा अचानक तेज़ हो गई। अप्सरा ने खिड़की की तरफ देखा। उसे नहीं पता था कि कॉलेज जाने से पहले ही उसकी ज़िंदगी का रास्ता यहीं से बदल चुका है।
नाश्ता खत्म होते ही अप्सरा चुपचाप उठी और अपने कमरे की तरफ बढ़ गई। माधुरी भी उसके पीछे-पीछे चली आई। दरवाज़ा बंद होते ही माधुरी ने जैसे साँस छोड़ी। “अप्सरा,” उसने धीमी आवाज़ में कहा, “आज कुछ बहुत गड़बड़ है।” अप्सरा पलंग के किनारे बैठ गई। “है ना?” उसने पहली बार अपने मन की बात कही, “इतना अच्छा व्यवहार… ये उनकी आदत नहीं है।”
माधुरी ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए कहा, “मुझे डर लग रहा है। जब तेरी चाची ऐसे मीठा बोलती हैं ना, तब कुछ न कुछ तय करके ही बोलती हैं।” अप्सरा ने नज़रें झुका लीं। उसे डर से ज़्यादा थकान महसूस हो रही थी। “शायद कॉलेज के कारण बदल गई हों,” उसने खुद को समझाने की कोशिश की, लेकिन आवाज़ में भरोसा नहीं था।
माधुरी उसके पास आकर बैठ गई। “जो भी हो,” उसने अप्सरा का हाथ थामते हुए कहा, “कॉलेज में खुद को कमजोर मत समझना। तू जैसी है, ठीक है।” अप्सरा हल्की-सी मुस्कुरा दी। यह मुस्कान धन्यवाद की थी, भरोसे की थी। बाहर से मेघना की आवाज़ आई
“अप्सरा, जल्दी करो। देर हो रही है।” दोनों एक-दूसरे को देखकर चुप हो गईं।
थोड़ी देर बाद अप्सरा बैग कंधे पर डालकर बाहर निकली। घर की देहलीज़ पार करते समय वह पल भर के लिए रुकी। उसे लगा जैसे यह घर आज कुछ ज़्यादा ही शांत है। माधुरी उसके साथ बाहर तक आई। सड़क पर सुबह की हलचल थी रिक्शे, बसें, लोगों की आवाज़ें। अप्सरा ने पहली बार महसूस किया कि वह किसी नए रास्ते पर चल रही है।
कॉलेज की बस आई तो अप्सरा ने चढ़ते हुए पीछे मुड़कर देखा। माधुरी वहीं खड़ी थी, हाथ हिलाते हुए। बस आगे बढ़ गई। खिड़की से बाहर देखती हुई अप्सरा सोचने लगी यह सिर्फ़ कॉलेज का सफ़र नहीं है। यह उसके जीवन का पहला कदम है, जहाँ शायद वह सिर्फ़ किसी की भतीजी या काम करने वाली लड़की नहीं, बल्कि खुद “अप्सरा” बन पाएगी।
बस शहर की भीड़ में गुम हो गई, और अप्सरा के भीतर कहीं एक नई कहानी चुपचाप आकार लेने लगी।
आइये अगले एपिसोड को पड़ते है


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