05

चमत्कार हुआ क्या

पिछले भाग में अपने पड़ा,
गुफा के अंदर का धुंआ और गहरा हो गया।
अब वो धुंआ सिर्फ हवा नहीं लग रहा था…
वो जैसे किसी की मौजूदगी बन गया हो।
अप्सरा की सांस अटक गई।
क्योंकि मूर्ति के पास…
पत्थर के नीचे…
कुछ हल्का-सा चमक रहा था…
और वो चमक…
बिल्कुल वैसी ही थी…
जैसे उसके लॉकेट की। ✨
अब आगे,
तभी उसने जल्दी से हाथ बढ़ाया…
और उस चमकती हुई चीज़ को उठाया।
उसकी उंगलियाँ जैसे ही उसे छू पाईं…
वो एक पल को कांप गई।
क्योंकि वो…
उसी का लॉकेट था।
अप्सरा की आंखें फैल गईं।
उसकी सांस रुक गई…
और अगले ही पल उसके चेहरे पर ऐसा सुकून उतर आया
जैसे किसी ने उसकी टूटी हुई रूह को वापस जोड़ दिया हो।
उसने लॉकेट को अपनी हथेली में कसकर पकड़ लिया…
और उसे सीने से लगा लिया।
उसका चेहरा खुशी से भर गया।
आंखों में आँसू थे…
लेकिन इस बार वो आँसू दर्द के नहीं थे…
राहत के थे।
उसके होंठ कांपते हुए मुस्कुरा उठे।
और उस चेहरे पर…
एक ऐसी मासूम खुशी थी कि अगर कोई उसे उस पल देख ले,
तो बस…
उसे देखते ही रह जाए।
वो धीरे से बुदबुदाई—
“माँ… पापा… मिल गया…”
उसने कांपते हाथों से लॉकेट को वापस अपने गले में पहनने की कोशिश की…
लेकिन तभी…
उसके शरीर में एक अजीब-सी सुस्ती उतरने लगी।
जैसे किसी ने उसकी सारी ताकत
धीरे-धीरे खींच ली हो।
उसकी पलकों पर भारीपन आने लगा।
आँखें झपकने लगीं…
सिर हल्का सा घूमने लगा…
अप्सरा ने खुद को संभालने की कोशिश की।
“नहीं… मुझे… मुझे जाना है…”
लेकिन उसके कदम लड़खड़ा गए।
उसे लगने लगा…
मानो उसे नींद आ रही है।
गहरी…
बहुत गहरी…
जैसे कोई उसे बुला रहा हो…
नीचे…
और नीचे…
उसने मूर्ति का सहारा लेने के लिए हाथ बढ़ाया…
लेकिन हाथ हवा में ही रह गया।
और अगले ही पल…
उसकी आँखें आधी बंद हो गईं।
लॉकेट उसकी मुट्ठी में था…
और उसका शरीर धीरे-धीरे ढलने लगा…
सीधा…
उसी पत्थर की मूर्ति की गोद की तरफ…
और अगले ही पल…
वो उसी पत्थर की मूर्ति की गोदी में थी।
जैसे कोई अदृश्य हाथ उसे गिरने नहीं दे रहा था…
जैसे पत्थर की ठंडक भी उस वक्त माँ की गोद बन गई हो।
अप्सरा की पलकों ने आख़िरी बार काँपकर झपका…
और फिर वो पूरी तरह ढल गई।
उसका सिर मूर्ति के सीने पर टिक गया…
हाथ में वो लॉकेट अब भी कसकर पकड़ा हुआ था,
जैसे वो उसे फिर कभी खोना नहीं चाहती।
उसके चेहरे पर डर नहीं था।
ना घबराहट… ना बेचैनी…
बस एक गहरी शांति थी।
मानो…
यही उसका सुकून हो।
और उसी पल गुफा की हवा फिर से बदल गई।
धुंआ धीरे-धीरे घना होने लगा…
जैसे कोई परछाईं जाग रही हो।
मूर्ति के माथे पर हल्की-सी चमक उभरी…
और उसकी आँखों में एक पल के लिए
लाल रोशनी झलक गई।
बहुत हल्की…
पर इतनी कि अंधेरा भी समझ जाए।
जब उसकी आँख खुली…
तो उसने खुद को अपने घर के बेड पर पाया।
वो एकदम से उठ बैठी।
सांस तेज़ थी…
और दिल अब भी उसी गुफा के अंधेरे में अटका हुआ था।
उसने अपने हाथों को देखा…
अपने पैरों को…
अपने माथे को छुआ…
कोई चोट नहीं।
कोई खरोंच नहीं।
ना सिर पर वो दर्द…
ना शरीर पर वो थकान।
जैसे कल रात कुछ हुआ ही नहीं था।
जैसे किसी ने उसकी सारी तकलीफ
एक ही पल में मिटा दी हो।
अप्सरा की आंखें भर आईं।
उसने जल्दी से घड़ी की तरफ देखा…
सुबह के 5 बज रहे थे।
उसके अंदर एक झटका सा लगा।
“काम…!”
उसने खुद से कहा।
उसे घर के सारे काम करने थे।
वो 12 साल से वही कर रही थी।
रोज़ सुबह उठना, झाड़ू, पोछा, बर्तन, खाना…
और फिर दिन भर के ताने।
वो हड़बड़ाकर बेड से उतरी…
और डरते हुए कमरे से बाहर निकली।
लेकिन जैसे ही वो बाहर आई…
उसके कदम अपने आप रुक गए।
क्योंकि…
घर में सब कुछ साफ़ था।
फर्श चमक रहा था।
बर्तन धुले हुए रखे थे।
और किचन से…
खाने की खुशबू आ रही थी।
वो धीरे-धीरे किचन की तरफ बढ़ी।
और वहाँ…
खाना तैयार था।
दाल की हल्की भाप उठ रही थी।
रोटियाँ ढकी हुई थीं।
सब्ज़ी रखी हुई थी…
जैसे कोई अभी-अभी बनाकर गया हो।
अप्सरा की आँखें फटी रह गईं।
“ये… ये सब किसने…?”
उसने अपने दोनों हाथ अपने मुँह पर रख लिए।
उसका दिमाग घूमने लगा।
ये सब उसके लिए किसी सपने जैसा था।
क्योंकि 12 साल में…
ये पहली सुबह थी…
जब उसे कोई काम नजर नहीं आ रहा था।
उसके भीतर डर भी था…
और हैरानी भी…
अप्सरा के हाथ अपने आप कांपने लगे।
उसने चारों तरफ देखा… जैसे दीवारें भी उसे सुन रही हों।
उसके दिल में अचानक एक डर बैठ गया…
इतना बड़ा डर, जो चोट से भी ज्यादा दर्द करता है।
“कहीं…”
उसने धीरे से खुद से कहा,
“कहीं चाची… मुझे घर से निकाल न दे…”
उसकी सांसें तेज़ हो गईं।
क्योंकि उसके दिमाग में सिर्फ़ एक ही बात घूम रही थी—
जरूर उन्होंने कोई काम वाली रख ली होगी…
अब उसे मेरी जरूरत नहीं रही…
अब मैं बोझ बन गई हूँ…
उसने घबराकर अपने कपड़ों को देखा,
अपने हाथों को देखा…
जैसे वो खुद को साबित करना चाहती हो कि वो काम कर सकती है।
वो जल्दी से किचन में इधर-उधर देखने लगी…
कहीं कोई बर्तन बचा हो…
कोई झाड़ू पड़ा हो…
कोई काम जो वो तुरंत कर दे…
लेकिन सब कुछ…
पूरा था।
और यही बात उसे और ज्यादा डराने लगी।
उसने होंठ दबाए, आंखों में पानी भर आया।
उसका गला भर गया।
“अगर चाची ने मुझे निकाल दिया…”
“तो मैं कहाँ जाऊँगी…?”
उसके कदम लड़खड़ा गए।
वो दीवार का सहारा लेकर खड़ी रही।
और तभी…
उसे पीछे से किसी के आने की आहट सुनाई दी।
धीमे कदम…
लेकिन साफ़।
अप्सरा की सांस रुक गई।
उसने डरते हुए गर्दन मोड़ी…
और उसकी आँखें अपने आप नीचे झुक गईं…
जैसे वो पहले से ही डाँट सुनने के लिए तैयार हो गई हो।
सीढ़ियों से उतरती हुई मेघना चतुर्वेदी दिखाई दीं।
उनके पैरों की आहट सुनते ही अप्सरा का शरीर अपने आप सख्त हो गया।
वो वहीं किचन के पास खड़ी रह गई…
सांसें रुक-रुक कर चलने लगीं…
और आँखें डर से झुक गईं।
मेघना की नजर जैसे ही अप्सरा पर पड़ी…
वो उसकी तरफ बढ़ीं।
अप्सरा ने देखा…
मेघना का हाथ उसके चेहरे की तरफ आ रहा है।
अप्सरा एकदम सिहर गई।
उसके अंदर वही पुराना डर जाग उठा—
“अब थप्पड़ पड़ेगा…”
उसने पलभर में आँखें बंद कर लीं…
कंधे सिकुड़ गए…
और शरीर अपने आप पीछे हट गया।
लेकिन…
हुआ बिल्कुल उल्टा।
मेघना ने थप्पड़ नहीं मारा…
मेघना ने प्यार से उसके गाल पर हाथ रख दिया।
अप्सरा की पलकों के नीचे आँसू काँप गए।
उसने धीरे से आँखें खोलीं…
और मेघना की आवाज़ आई…
इस बार तानों वाली नहीं…
बल्कि अजीब-सी नरमी वाली—
“बेटा… अभी क्यों उठ गई?”
“जाओ… सो जाओ।”
“इतनी जल्दी उठने की क्या जरूरत थी?”
अप्सरा जैसे पत्थर बन गई।
उसे यकीन ही नहीं हो रहा था।
उसका दिल धड़क रहा था,
लेकिन इस बार डर से नहीं…
हैरानी से।
मेघना ने फिर से कहा, जैसे ये बात दुनिया की सबसे सामान्य बात हो—
“जाओ… मैं उठ दूंगी।”
“तुम्हें कॉलेज भी तो जाना है…”
“तुम्हें।”
अप्सरा की आंखें भर आईं।
उसके होंठ हिले…
पर आवाज़ बाहर नहीं निकली।
उसके दिमाग में सिर्फ़ एक ही सवाल था—
ये… आज क्या हो गया है?
तभी अप्सरा को मेघना का हाथ अपने हाथों पर महसूस हुआ…
वो उसे थामे हुए थी।
सच में… थामे हुए।
मेघना उसे धीरे-धीरे उसके कमरे तक ले गई।
अप्सरा के कदम लड़खड़ा रहे थे…
पर इस बार कोई डांट नहीं थी…
कोई ताना नहीं था…
बस एक अजीब-सी शांति थी।
कमरे में आते ही मेघना ने उसे बेड पर बिठाया…
और फिर बहुत प्यार से उसे लिटा दिया।
अप्सरा की आँखें फटी की फटी रह गईं।
वो कुछ बोलना चाहती थी…
लेकिन शब्द जैसे उसके गले में अटक गए।
मेघना ने उसके माथे पर हल्का सा हाथ रखा…
और बस इतना कहा—
“सो जा बेटा… आराम कर।”
फिर वो चुपचाप कमरे से बाहर चली गई।
दरवाज़ा बंद हुआ…
और अप्सरा अकेली रह गई।
वो बेड पर पड़ी-पड़ी छत को देखने लगी।
उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
उसके अंदर डर भी था…
और एक उम्मीद भी…
जो उसे खुद समझ नहीं आ रही थी।
उसने कांपते हुए अपने गले का लॉकेट पकड़ा…
और आँखें बंद कर लीं।
फिर बहुत धीमे से…
बिल्कुल टूटी हुई आवाज़ में फुसफुसाई—
“ये सब… सपना है क्या महादेव…?”
“यकीन नहीं हो रहा मुझे तो…”
और उसके होंठों से एक छोटी-सी सिसकी निकल गई…
लेकिन इस बार वो सिसकी दुख की नहीं थी…
ये उस इंसान की थी
जिसे पहली बार
थोड़ा सा प्यार मिला हो… 🥺✨
मिलते हैं अगले एपिसोड में🤓

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Sirf Sadharan

Pro
सादा जीवन उच्च विचार जीवन का हो आधार