
Chapter - 4
अब आगे,
दरवाज़े के पास खड़ी वो कांप रही थी…
फिर भी उसने अपनी आवाज़ को संभालते हुए जवाब दिया—
“आई चाची… बस थोड़ी देर में…”
बाहर कुछ पल के लिए सन्नाटा हुआ…
फिर किसी के कदम दूर हटे, लेकिन गुस्सा वहीं था।
लड़की ने धीरे से सांस ली।
उसके हाथ अब भी काँप रहे थे।
वो मुड़ी और कमरे के कोने में रखे
एक छोटे से शीशे के सामने चली गई।
शीशे में खुद को देखते ही
उसकी आंखें भर आईं।
उसके सिर पर वो चोट साफ़ दिख रही थी…
कल रात की वो मार…
वो गिरना…
वो दर्द…
सब कुछ उसकी त्वचा पर लिखा हुआ था।
उसने कांपते हाथों से अपने बाल हटाकर
उस जख्म को छुआ…
और दर्द की एक लहर उसके पूरे शरीर में दौड़ गई।
“आह…”
उसके होंठों से धीमी-सी कराह निकल गई।
उसने जल्दी से अपने आँसू पोंछे।
क्योंकि रोने का वक्त नहीं था।
वो डरती हुई अलमारी की तरफ गई…
और चुपचाप कपड़े बदले।
फटे हुए कपड़ों को उसने जल्दी से छुपा दिया…
जैसे वो कपड़े नहीं…
उसकी शर्म और दर्द का सबूत हों।
फिर उसने अपने बाल ठीक किए,
अपने चेहरे को हाथों से दबाकर खुद को संभाला…
और एक लंबी सांस लेकर
दरवाज़े की तरफ बढ़ी।
दरवाज़ा खोलते हुए उसका दिल जोर से धड़क रहा था।
वो कमरे के बाहर निकली…
धीरे-धीरे… डरती हुई…
जैसे घर के अंदर भी
उसके लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं बची थी।
वो बाहर निकली तो उसे लगा…
रास्ता साफ है।
शायद आज कोई कुछ नहीं बोलेगा…
शायद वो चुपचाप सीधे किचन में चली जाएगी।
लेकिन जैसे ही उसने दो कदम बढ़ाए…
अचानक किसी ने पीछे से उसके बाल पकड़ लिए।
उसकी गर्दन झटके से पीछे हुई,
आँखों में दर्द उतर आया… और होंठों से हल्की-सी चीख निकल गई।
“आह…!”
पीछे से एक औरत की आवाज़ आई…
तीखी, जहरीली और तानों से भरी हुई—
“आइए अप्सरा जी…”
“हमारे तो भाग्य खुल गए आपके दर्शन पाकर!”
उस औरत ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा,
जैसे वो इंसान नहीं… कोई मज़ाक हो।
फिर उसने नकली सम्मान के साथ हाथ जोड़कर कहा—
“स्वर्ग की अप्सरा हैं आप…!”
और उसी के साथ वो औरत हँसी…
ऐसी हँसी जिसमें प्यार नहीं, सिर्फ़ ज़हर था।
लड़की ने खुद को छुड़ाने की कोशिश की,
लेकिन बालों की पकड़ और कस गई।
“चाची… प्लीज़…”
उसने धीरे से कहा,
“मेरा सिर…”
पर उस औरत ने सुनने की बजाय
उसे जोर से धक्का दे दिया।
लड़की लड़खड़ाती हुई सीधी किचन में जा गिरी।
किचन की चौखट से उसका कंधा टकराया
और दर्द फिर से जाग उठा।
औरत उसके पीछे-पीछे अंदर आई,
गुस्से से मुँह बनाते हुए बोली—
“सुबह से भूखी मर रही हूँ… चल बना कुछ खाने को!”
फिर उसने नाक सिकोड़कर ताना मारा—
“आई बड़ी… ‘थोड़ी देर में आती हूँ’…”
उसने हाथ झटककर ऐसे किया
जैसे लड़की का होना ही उसके लिए बोझ हो।
लड़की चुप रही।
सिर्फ उसकी आंखें झुकी हुई थीं…
और हाथ कांप रहे थे।
किचन में गैस की हल्की-सी टिक-टिक थी…
और उस टिक-टिक के बीच
उसके अंदर कुछ टूट रहा था।
लेकिन वो कुछ कह नहीं सकती थी।
वो बस धीरे-धीरे उठी…
और चुपचाप चूल्हे की तरफ बढ़ गई…
जैसे उसका दर्द भी अब
घर के कामों की लिस्ट में
सबसे आख़िर में आता हो।
घर के सारे काम हो गए थे…
और अब शाम होने को आई थी।
दिन भर की थकान उसके शरीर में उतर चुकी थी।
हाथों में दर्द था… पैरों में जलन…
और मन में एक ऐसा बोझ, जिसे कोई देख नहीं सकता था।
सब कुछ निपटाकर वो चुपचाप अपने कमरे में आई।
दरवाज़ा बंद किया…
और दीवार से टिककर बैठ गई।
उसने गहरी सांस ली…
जैसे दिन भर की घुटन अब बाहर निकाल रही हो।
फिर अनजाने में…
उसका हाथ अपने गले तक गया।
उसने आँखें बंद कीं।
और रोते हुए… अपने माँ-बाप को याद करने लगी।
उसकी उंगलियाँ धीरे-धीरे उस जगह को छूने लगीं
जहाँ हमेशा एक छोटा सा लॉकेट रहता था…
वही लॉकेट…
जो उसके माता-पिता की आख़िरी निशानी थी।
लेकिन…
उसकी उंगलियों को वहाँ कुछ भी महसूस नहीं हुआ।
एक पल को उसे लगा शायद वो गलत जगह छू रही है।
उसने फिर से टटोला…
फिर एक बार और…
पर वहाँ…
कुछ नहीं था।
लॉकेट…
गायब था।
उसकी आँखें एकदम खुल गईं।
वो जैसे बिजली से झटका खाकर उठ बैठी।
दिल की धड़कन तेज़ हो गई…
और सांसें टूटने लगीं।
“न… नहीं…”
उसके होंठ काँपे।
“ये नहीं हो सकता…”
वो घबराकर अपने कपड़ों के अंदर हाथ डालकर देखने लगी…
तकिए के नीचे…
कंबल में…
फर्श पर…
पर लॉकेट कहीं नहीं था।
उसकी आँखों में आँसू और तेज़ हो गए।
अब ये सिर्फ़ एक चीज़ खोने का डर नहीं था…
ये उस आख़िरी रिश्ते का टूटना था
जो उसे अपने माँ-बाप से जोड़े हुए था।
वो फर्श पर बैठ गई…
और कांपते हुए खुद से बोली—
“माँ… पापा… आपकी आख़िरी निशानी भी…?”
उसकी उंगलियाँ खाली थीं…
लेकिन उसका दिल…
जैसे पूरी तरह खाली हो गया।
और तभी…
उसके दिमाग में एक बात बिजली की तरह कौंधी…
उसने न आव देखा… न ताव।
बस एक ही चीज़ उसके दिमाग में थी—
लॉकेट।
वो भागते हुए घर से निकल गई।
न किसी को बताया…
न किसी से पूछना जरूरी समझा…
और सीधे जंगल की तरफ दौड़ पड़ी।
हवा उसके चेहरे से टकरा रही थी,
पेड़ों की शाखाएँ उसके कपड़ों से उलझ रही थीं…
लेकिन वो रुकी नहीं।
कुछ ही देर में वो उसी जगह पहुँच गई…
जहाँ कल रात उसकी दुनिया टूट गई थी।
वो जमीन के नीचे वाली वही गुफा…
जैसे ही उसने वहाँ कदम रखा,
अंदर अचानक एक धुंआ सा फैलने लगा।
हल्का-हल्का…
पतला-सा…
जैसे किसी ने धूप नहीं…
कोई पुरानी राख हवा में उड़ा दी हो।
लेकिन अप्सरा ने उस पर ध्यान नहीं दिया।
उसकी आंखों में बस लॉकेट था…
और दिल में बस एक डर।
अभी अंधेरा नहीं हुआ था।
दिन की रोशनी ऊपर की दरारों से अंदर तक आ रही थी…
इसलिए गुफा उतनी डरावनी नहीं लग रही थी।
लेकिन फिर भी…
उसकी दीवारों की ठंडक वही थी।
वही सन्नाटा…
और वही अजीब-सी भारी हवा।
अप्सरा गुफा के कोने-कोने में खोज चुकी थी।
पत्थरों के बीच हाथ डाला…
मिट्टी हटाई…
हर जगह नजर दौड़ाई…
पर कहीं भी…
वो लॉकेट नहीं मिला।
उसकी सांसें टूटने लगीं।
उम्मीद धीरे-धीरे खत्म होने लगी।
वो वहीं बैठ गई…
आंखों में आँसू भर आए…
और फिर… वो रो पड़ी।
बिल्कुल बच्चों की तरह…
जिसका सब कुछ छिन गया हो।
“माँ… पापा…”
उसकी आवाज़ काँप रही थी,
“मुझे वो वापस चाहिए…”
उसने दोनों हथेलियों से अपना चेहरा ढक लिया।
और सिसकियाँ गुफा में गूंजने लगीं।
तभी…
उसे लगा जैसे किसी ने
बहुत धीमे से…
उसके कान के पास फुसफुसाया हो।
“यहाँ…”
अप्सरा एकदम चौंक गई।
उसने सिर उठाया।
आँखें लाल थीं…
चेहरा भीगा हुआ…
और सांसें बिखरी हुई।
उसने इधर-उधर देखा…
कोई नहीं था।
लेकिन वो फुसफुसाहट…
वो फिर आई।
“इधर…”
अप्सरा डरते हुए पीछे मुड़ी।
और फिर… उसकी नजरें वहीं टिक गईं।
वही पत्थर की मूर्ति।
वही शांत चेहरा…
वही गोद…
जिसने कल रात उसे थाम लिया था।
अप्सरा धीरे-धीरे उठी।
कदम अपने आप उस तरफ बढ़ने लगे…
जैसे कोई उसे खींच रहा हो।
वो मूर्ति के सामने आकर खड़ी हो गई।
उसने कांपते हुए मूर्ति की आँखों में देखा…
और उसी पल…
गुफा के अंदर का धुंआ और गहरा हो गया।
अब वो धुंआ सिर्फ हवा नहीं लग रहा था…
वो जैसे किसी की मौजूदगी बन गया हो।
अप्सरा की सांस अटक गई।
क्योंकि मूर्ति के पास…
पत्थर के नीचे…
कुछ हल्का-सा चमक रहा था…
और वो चमक…
बिल्कुल वैसी ही थी…
जैसे उसके लॉकेट की। ✨
आगे की कहानी जानने के लिए पड़ते रहिए
अब नए चैप्टर के साथ 👋


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