
अब आगे,
जैसे ही उन चारों में से एक लड़का आगे बढ़ा…
और मूर्ति की गोदी में पड़ी लड़की को उठाने के लिए हाथ बढ़ाया…
उस पल…
मूर्ति की आँखें लाल होने लगीं।
पहले हल्की-सी चमक…
फिर गहरी…
और फिर ऐसी लाल रोशनी, जैसे पत्थर के अंदर आग जल उठी हो।
लड़के की उंगलियाँ हवा में ही रुक गईं।
उसकी सांस गले में अटक गई।
चेहरे का नशा उतर गया…
और आँखों में पहली बार… मौत का सच दिखा।
“न-नहीं… ये… ये क्या है…?”
उसके होंठ काँपने लगे।
हवा अचानक ठंडी नहीं…
तेज़ हो गई।
ऐसी जैसे किसी ने पूरे सुरंग में सांस लेकर
सब कुछ खींच लिया हो।
लड़का कांपने लगा…
उसका शरीर जैसे किसी अदृश्य ताकत ने पकड़ लिया हो।
वो पीछे हटना चाहता था…
चिल्लाना चाहता था…
भागना चाहता था…
लेकिन…
उसके पैर जमीन पर थे ही नहीं।
और फिर…
फुस्स्स…
एक झटके में उसका अस्तित्व…
हवा की तरह बिखर गया।
ना खून…
ना चीख…
ना शरीर…
बस…
गायब।
कुछ ही पलों में।
बाकी तीनों दोस्त वहीं जम गए।
उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं।
किसी की सांस नहीं निकल रही थी,
किसी के हाथ से मोबाइल नीचे गिर गया।
“भाई…?”
एक ने सूखे गले से कहा…
“वो… वो कहाँ गया…?”
दूसरा लड़का पीछे हटने लगा,
उसके होंठ नीले पड़ने लगे।
“न-नहीं… चलो… चलो यहाँ से…”
तीसरे ने कांपते हुए पीछे देखा…
और उसी पल उसकी चीख निकल गई—
“पीछे… पीछे देखो…!”
तीनों ने जैसे ही पलटकर देखा…
उनके पीछे…
अंधेरे में…
तीन पिशाच खड़े थे।
उनकी आँखें लाल नहीं…
भूखी थीं।
ऐसी भूख, जो मांस नहीं…
डर खाती है पहले।
उनके दाँत लंबे थे…
और होंठों पर वो मुस्कान…
जिसमें इंसानियत नहीं होती।
एक पिशाच ने गर्दन हल्की-सी टेढ़ी की,
जैसे वो उनके दिल की धड़कन सुन रहा हो।
दूसरे ने जीभ से अपने होंठों पर
धीरे-धीरे उंगलियों जैसी ठंडी लकीर खींची…
और तीसरे ने बस एक कदम आगे बढ़ाया।
धप्प…
उस एक कदम की आवाज़ से
तीनों लड़कों की रूह काँप गई।
वो पीछे हटे…
लेकिन पीछे… रास्ता नहीं था।
क्योंकि उनके पीछे…
वो मूर्ति थी।
और सामने…
भूख।
एक लड़का रो पड़ा—
“हमने कुछ नहीं किया… प्लीज़…”
लेकिन पिशाचों की आँखों में दया नहीं थी।
उनकी नजरें एक साथ
मूर्ति की गोदी में पड़ी लड़की पर गईं…
और फिर वापस उन तीनों पर।
जैसे वो तय कर रहे हों…
पहले कौन।
तीनों लड़के वहीं गिर पड़े…
उनके शरीर ने जवाब दे दिया।
और अंधेरे में पिशाचों की मुस्कान और चौड़ी हो गई।
सूरज निकल चुका था…
और उसकी हल्की-हल्की रोशनी जमीन के ऊपर से फिसलती हुई,
किसी दरार के रास्ते नीचे उतर आई थी।
वो रोशनी…
धीरे-धीरे सरकती हुई…
सीधी उस लड़की के चेहरे पर आकर ठहर गई।
उसकी पलकों पर उजाला पड़ा…
और कुछ पल बाद उसकी आँखें धीरे-धीरे खुलीं।
पहले धुंध…
फिर परछाइयाँ…
फिर सामने की ठंडी, कठोर सच्चाई।
वो हड़बड़ाकर उठना चाहती थी…
लेकिन उसका शरीर भारी था।
सिर में अब भी दर्द था, जैसे कोई धड़कता हुआ पत्थर भीतर रख दिया गया हो।
और तभी उसे एहसास हुआ…
वो जमीन पर नहीं थी।
वो…
उस मूर्ति की गोदी में थी।
उसका सिर उसी पत्थर की छाती पर टिका था,
और उसका शरीर ऐसे रखा हुआ था
मानो किसी ने उसे गिरने नहीं दिया…
मानो…
उस पत्थर की मूर्ति ने उसे थामे रखा हो।
लड़की ने कांपते हाथों से खुद को संभाला,
और डरते-डरते ऊपर देखा।
मूर्ति का चेहरा शांत था।
आँखें पत्थर की थीं…
फिर भी… उस शांति में एक अजीब-सी ताकत थी।
जैसे वो सिर्फ मूर्ति नहीं…
किसी की मौजूदगी हो।
लड़की की सांस धीमी हो गई।
उसने अपने माथे पर हाथ रखा…
खून सूख चुका था…
पर दर्द अभी भी था।
उसने खुद को धीरे से पीछे किया…
और मूर्ति से अलग होने लगी…
लेकिन उसी पल उसे लगा जैसे
पत्थर की ठंडक के अंदर
कुछ गर्म-सा जाग गया हो।
हवा एक बार फिर हल्की सी घूमी…
और सुरंग में पड़ा सन्नाटा
कुछ पल के लिए और गहरा हो गया।
लड़की ने अपने आसपास देखा…
वो लड़के…
वो चीखें…
वो डर…
सब गायब था।
बस वो थी…
और वो पत्थर की मूर्ति।
और सूरज की वो पतली सी रोशनी…
जो अब उसके चेहरे पर नहीं,
उस मूर्ति के माथे तक जा रही थी…
जैसे किसी ने ऊपर से
इशारा किया हो।
लड़की के होंठ धीरे से हिले…
उसने कांपती हुई नजरें उठाईं…
और उस पत्थर की मूर्ति की आँखों में देख लिया।
पत्थर की आँखें…
फिर भी ऐसा लगा जैसे वो उसे देख रही हों।
जैसे वो जानती हों कि उसके अंदर क्या टूटा है…
और क्या बचा है।
बस उसी एक पल में…
रात की सारी घटना उसकी आँखों के सामने घूम गई।
सड़क…
फॉरच्यूनर…
हँसी…
घेर लेना…
भागना…
जंगल…
गिरना…
अंधेरा…
और वो डर…
उसका शरीर फिर से काँपने लगा।
गला भर आया।
होंठ हिले, लेकिन आवाज़ नहीं निकली।
और फिर…
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
पहले धीरे-धीरे…
फिर जैसे अंदर का सारा दर्द बाहर निकल आया हो।
वो खुद को रोक नहीं पाई।
वो आगे झुकी…
और रोते हुए उस पत्थर की मूर्ति के गले लग गई।
उसकी उंगलियाँ उस ठंडी पत्थर की पीठ पर कस गईं,
जैसे वो किसी इंसान को पकड़ रही हो।
जैसे अगर उसने छोड़ दिया…
तो वो फिर से उसी रात में गिर जाएगी।
वो जी भर कर रोने लगी।
ऐसा रोना जिसमें शब्द नहीं होते…
बस सांसें टूटती हैं…
और दिल का बोझ हल्का होने लगता है।
“मैंने कुछ नहीं किया था…”
उसने सिसकते हुए कहा,
“मैंने… किसी का क्या बिगाड़ा था…?”
उसकी आवाज़ पत्थरों से टकराकर वापस लौट आई…
और वो और भी ज़ोर से रोने लगी।
उसके आँसू पत्थर पर गिर रहे थे।
और अजीब बात ये थी…
पत्थर की ठंडक के बावजूद,
उसे पहली बार लगा…
वो अकेली नहीं है।
उसने माथा मूर्ति के कंधे से टिकाया,
और एक टूटती हुई फुसफुसाहट में बोली।
फिर उसने धीरे से मूर्ति को छोड़ा।
जैसे किसी अपने का सहारा छोड़ रही हो…
पर मजबूरी में।
वो लड़खड़ाते कदमों से खड़ी हुई।
पैरों में दर्द था, शरीर में कमजोरी…
लेकिन अंदर कहीं एक जिद थी…
अब यहाँ नहीं रुकना।
उसने चारों तरफ देखा…
गुफा की दीवारें ठंडी थीं,
अंधेरा अब भी था…
लेकिन ऊपर से आती सूरज की पतली रोशनी
उसे रास्ता दिखा रही थी।
वो उसी रोशनी की तरफ बढ़ने लगी…
धीरे-धीरे… सावधानी से…
हर कदम पर उसे लग रहा था जैसे
गुफा उसके पीछे बंद हो जाएगी।
जैसे वो उसे वापस खींच लेगी।
लेकिन वो चलती रही।
पत्थरों के बीच से निकलते हुए,
कभी हाथ दीवार पर टिकाती…
कभी गिरते-गिरते बचती…
और आखिरकार…
उसे सामने एक संकरा सा रास्ता दिखा
जहाँ से हवा आ रही थी।
बाहर की हवा।
उसने गहरी सांस ली…
और उसी उम्मीद के साथ आगे बढ़ गई।
जैसे ही वो बाहर की तरफ निकली…
सूरज की रोशनी ने उसके चेहरे को छुआ।
उसने आंखें मींच लीं…
कुछ पल तक रोशनी सह नहीं पाई।
फिर धीरे से आंखें खोलीं…
और बाहर…
जंगल वैसा ही था।
लेकिन अब वो रात वाला जंगल नहीं था।
ये सुबह का जंगल था…
जहाँ पत्तों पर ओस थी,
और हवा में डर नहीं…
बस सन्नाटा था।
वो एक पल को रुकी…
पीछे मुड़कर गुफा के मुंह को देखा।
उसका दिल कांप गया।
क्योंकि गुफा का मुंह…
अब वैसा नहीं लग रहा था
जैसा वो अंदर जाते वक्त था…
जैसे वो जगह
उसके लिए खुली थी।
और अब…
उसके पीछे बंद हो रही थी।
लड़की ने घबराकर कदम तेज़ कर दिए…
पर उसे पता नहीं था…
वो बाहर तो निकल आई थी,
लेकिन कहानी…
अब वो गुफा से बाहर थी… और तेज़ कदमों से अपने घर की तरफ बढ़ने लगी।
सुबह की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी, लेकिन उसके अंदर अब भी रात का अंधेरा जिंदा था।
नंगे पैर मिट्टी में सने थे…
कपड़े अस्त-व्यस्त थे…
और सिर का दर्द उसे हर पल याद दिला रहा था कि ये कोई सपना नहीं था।
वो किसी से नज़र नहीं मिलाना चाहती थी।
ना किसी सवाल का जवाब देना…
ना किसी की दया सुनना…
बस एक ही बात उसके भीतर गूंज रही थी—
“घर… बस घर पहुंचना है…”
कुछ देर बाद वो अपने घर के सामने थी।
उसने कांपते हाथों से कुंडी पकड़ी…
दरवाज़ा खोला… और अंदर कदम रख दिया।
जैसे ही वो घर के अंदर आई…
उसने तुरंत दरवाज़ा धड़ाम से बंद कर लिया।
और कांपते हाथों से कुंडी चढ़ा दी।
पीठ दरवाज़े से टिकाकर वो कुछ पल वहीं खड़ी रही…
सांसें तेज़…
दिल बेकाबू…
फिर उसने खुद को संभाला और बिना किसी को देखे…
सीधे अपने छोटे से कमरे की तरफ बढ़ गई।
कमरे के अंदर आते ही उसने दरवाज़ा बंद किया…
और दीवार के सहारे बैठती चली गई।
उसकी आंखों से आँसू बह निकले…
इस बार बिना आवाज़ के।
कमरा छोटा था…
पर उस वक्त उसे वही दुनिया का सबसे सुरक्षित कोना लग रहा था।
वो बस वहीं बैठी रही…
अपने घुटनों को सीने से लगाकर…
रोते-रोते… वो कब थक गई, उसे खुद पता नहीं चला।
आँखों से आँसू बहते रहे… सांसें धीरे-धीरे धीमी होती गईं…
और फिर वो वहीं जमीन पर लुढ़क गई।
या यूं कहें…
कमज़ोरी ने उसे बेहोश कर दिया।
कमरे में सन्नाटा था।
बस उसकी टूटी हुई सांसें…
और बाहर की दुनिया से कटे हुए वो कुछ पल…
लेकिन ये सुकून ज्यादा देर टिक नहीं पाया।
कुछ समय बाद उसकी आंख खुली…
और वो भी ऐसे, जैसे किसी ने झकझोरकर उठा दिया हो।
क्योंकि उसके कमरे के दरवाजे पर
जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी।
“कर्मजली! मनहूस! कहाँ मर गई थी?!”
“सो रही है अब? बाहर आ!”
दरवाजे पर धड़-धड़ करके हाथ मारा गया।
इतनी तेज़ कि दीवारें भी काँप उठीं।
लड़की घबराकर उठ बैठी।
उसका सिर घूम गया।
आँखें सूजी हुई थीं…
और शरीर में इतनी कमजोरी थी कि हाथ भी भारी लग रहे थे।
वो कुछ बोलना चाहती थी…
लेकिन आवाज़ गले में अटक गई।
दरवाजे के बाहर फिर वही कड़वी आवाज़ आई—
“आ रही है या दरवाज़ा तोड़ दूँ?!”
लड़की की सांस तेज़ हो गई।
उसने कांपते हाथों से अपने कपड़ों को ठीक करने की कोशिश की…
बालों को समेटा…
और धीरे-धीरे उठकर दरवाजे की तरफ बढ़ी।
लेकिन उसके कदम रुक गए।
तो कैसा लगा आपको आज का एपिसोड 😀?


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