
Chapter 2
आगे,
उन लड़कों ने फिर भी उसका पीछा नहीं छोड़ा।
ऊपर… जंगल की हवा में डर घुल चुका था,
लेकिन शराब और हवस ने उनके अंदर की समझ को पहले ही मार दिया था।
“नीचे चली गई है…”
एक ने झांकते हुए कहा,
“चलो… निकालते हैं इसे!”
दूसरा पलभर हिचका…
उसकी आवाज़ लड़खड़ा रही थी,
“भाई… ये… ये जगह ठीक नहीं लग रही…”
लेकिन तीसरे ने गुस्से में धक्का दिया—
“डरपोक है क्या? चल!”
और फिर…
एक-एक करके…
वो भी उसी धंसी हुई जमीन के अंदर उतरने लगे।
पहले वाला नीचे कूदा।
फिर दूसरा…
फिर तीसरा…
और आखिर में चौथा।
नीचे आते ही उनकी आवाज़ें बदल गईं।
यहाँ हवा भारी थी…
ठंडी नहीं, बल्कि ऐसी जैसे किसी बंद जगह में पुरानी सांसें जमा हों।
उधर लड़की…
वो जमीन पर पड़ी थी।
उसका सिर एक पत्थर से टकराया था।
और अब उसके माथे से खून की पतली लकीर बहकर गाल तक आ चुकी थी।
उसकी आँखें धुंधली थीं…
कान में हल्की सी सीटी बज रही थी…
और सांसें ऐसे चल रही थीं जैसे हर सांस पर किसी ने पत्थर रख दिया हो।
वो उठ नहीं पा रही थी।
बस घिसट सकती थी।
लेकिन तभी उसे एहसास हुआ…
वो लोग भी यहीं आ रहे हैं।
ऊपर से उनके कूदने की आवाज़ आई…
मिट्टी गिरने की आवाज़…
और फिर उनके जूतों की आहट…
धीमी…
पर साफ़।
लड़की के शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।
उसने दोनों हाथों के सहारे खुद को खींचना शुरू किया…
रेंगती हुई…
एक पत्थर की तरफ।
उसने कांपते हुए उस बड़े पत्थर से टेक लगाई…
और अपने शरीर को उसके पीछे दबा लिया।
जैसे वो पत्थर उसे बचा लेगा।
जैसे वो पत्थर… उसे छुपा लेगा।
उसने अपनी हथेली से मुँह ढक लिया,
ताकि उसकी रोने की आवाज़ बाहर ना निकले।
लेकिन उसकी सांसें…
वो उसे धोखा दे रही थीं।
उसकी आंखों से आँसू बहते रहे,
और खून की गर्मी उसके चेहरे पर फैलती रही।
उधर अंधेरे में…
एक लड़के की आवाज़ गूँजी—
“कहाँ गई…?”
दूसरा बोला—
“यहीं कहीं होगी… ढूंढो!”
तीसरा हँसा…
लेकिन अब उसकी हँसी में नशा कम था,
और डर ज्यादा।
“भाई… ये जगह… सच में अजीब है…”
तभी एक लड़का आगे बढ़ा।
उसके हाथ में मोबाइल की फ्लैशलाइट जल रही थी।
रोशनी दीवारों पर पड़ी…
तो दीवारें दीवारें नहीं लगीं…
वो दीवारें जैसे…
काली पड़ी हड्डियों से बनी हों।
लड़के की आवाज़ अटक गई—
“ये… क्या है ये…?”
लेकिन फिर भी वो रुका नहीं।
फ्लैशलाइट की रोशनी घूमती हुई…
धीरे-धीरे…
उस पत्थर के पास आने लगी…
जहाँ लड़की सांस रोककर छुपी थी।
लड़की ने आँखें बंद कर लीं।
उसके होंठ काँप रहे थे…
और दिल इतनी जोर से धड़क रहा था
कि उसे लग रहा था अभी आवाज़ बनकर बाहर निकल जाएगा।
रोशनी अब बस…
कुछ इंच दूर थी।
बस एक पल…
और तभी…
टप… टप…
ऊपर से पानी नहीं…
किसी चीज़ की बूंदें गिर रही थीं।
लड़के ने ऊपर देखा।
उसकी फ्लैशलाइट भी ऊपर गई…
तभी एक लड़के की नजर अचानक उस पत्थर के किनारे पर पड़ी…
वहाँ… बस एक हल्का-सा सूट का कपड़ा दिख रहा था।
उसकी आँखों में चमक आ गई।
वो समझ गया… शिकार यहीं है।
उसने तुरंत बाकी तीनों की तरफ देखा और उंगलियों से इशारा किया…
“शांत… नाटक करो।”
फिर वो ज़ोर से बोल पड़ा, बिल्कुल ऐसे जैसे सच में अब उसे कोई दिलचस्पी ही नहीं—
“छोड़ो यार… चलो अब रहने दो।
बहुत हो गया… ये जगह ठीक नहीं लग रही।
चलते हैं।”
बाकी तीनों ने भी उसी सुर में अभिनय शुरू कर दिया।
“हाँ भाई… सही कह रहा है।”
“चलो निकलते हैं… बेकार की झंझट है।”
“भाग गई होगी… अब क्या ढूंढना।”
उनकी आवाज़ें धीरे-धीरे दूर जाने लगीं…
कदमों की आहट पीछे हटने लगी…
और पत्थर के पीछे छुपी लड़की ने पहली बार
अपनी सांस थोड़ी खुलकर ली।
उसके कांपते हाथ अब भी खून से सने थे…
लेकिन दिल ने जैसे कहा—
“बच गई…”
वो पत्थर से टेक लगाए, आँखें बंद करके
बस एक पल के लिए रिलैक्स हुई…
और तभी…
धप्प!
अचानक उसके सामने से एक परछाईं उभरी।
उसने आंखें खोलीं तो…
चारों लड़के उसके सामने थे।
बहुत पास।
बहुत करीब।
और वही लड़का…
जिसने नाटक किया था,
धीरे से झुककर उसके सामने बैठ गया।
उसकी आवाज़ में हँसी नहीं थी…
अब सिर्फ़ ठंडा मज़ाक था—
“कहाँ जा रही थी…?”
“हम तो… चले ही गए थे ना?” 😈
लड़की की सांस फिर से टूट गई।
उसने पीछे हटने की कोशिश की…
लेकिन पत्थर उसकी पीठ में चुभ गया।
एक लड़का पीछे से बोला—
“अब तो कोई नहीं बचाएगा…”
दूसरा हँसते हुए आगे बढ़ा—
“बहुत चालाक बन रही थी…”
लड़की की आँखों में आँसू आ गए।
उसके होंठ कांप रहे थे…
और गला सूख चुका था।
वो बस इतना ही बोल पाई—
“प्लीज़… मुझे जाने दो…”
लेकिन चारों की आंखों में अब दया नहीं थी…
बस जीत थी।
एक लड़के ने झटके से लड़की के बाल पकड़कर उसे खींचा।
लड़की चीख पड़ी… उसकी आवाज़ पत्थरों से टकराकर गूँज गई।
“चुप!”
दूसरे ने गुस्से में कहा,
और उसके कपड़े को पकड़कर खींचा…
कपड़ा झटके में फट गया।
लड़की की आंखें भर आईं।
उसने खुद को ढकने की कोशिश की…
और पीछे हटने लगी।
तभी उनमें से एक ने झुंझलाकर पैर उठाया…
और जोर से उसे धक्का मार दिया।
“चिल्ला क्यों रही है?”
उसने दाँत पीसकर कहा।
“शांत रह…”
लड़की का शरीर हवा में डगमगाया…
और वो पीछे की तरफ जा गिरी।
सीधा…
एक पुराने पत्थर के चबूतरे पर।
वहाँ एक मूर्ति थी।
बहुत पुरानी… धूल में लिपटी हुई।
उसके चेहरे के भाव शांत थे…
पर आँखों में कुछ ऐसा था
जो देखने वाले को बेचैन कर दे।
लड़की गिरते-गिरते…
सीधा उस मूर्ति की गोदी में जा गिरी।
उसके सिर से खून अब भी बह रहा था।
आँखें आधी बंद…
सांसें टूटी हुई…
और उसी पल…
लड़की दर्द से तड़प रही थी…
उसकी सांसें अब जैसे टूट-टूटकर निकल रही थीं।
आँखों के आगे सब धुंधला था… आवाज़ें दूर… बहुत दूर।
फिर भी…
उसने कांपती पलकों से उस पत्थर की मूर्ति को देखा।
वो मूर्ति… शांत थी।
निर्जीव।
लेकिन उस पल लड़की को ऐसा लगा जैसे…
वो अकेली नहीं है।
उसके होंठ हिले…
आवाज़ नहीं निकली… बस एक नाम उसके भीतर गूंजा—
“शिव…”
उसने आंखें बंद कीं।
और जैसे अपने आख़िरी भरोसे को पकड़कर,
अपने भीतर ही भीतर शिव जी को याद किया।
उसकी उंगलियाँ पत्थर पर फिसल गईं…
शरीर की ताकत खत्म हो रही थी…
और दर्द अब धीरे-धीरे सुन्नपन में बदल रहा था।
उसने आख़िरी बार सांस ली…
एक लंबी… कांपती हुई…
और फिर…
उसका सिर मूर्ति के सीने से ढलका।
बेहोश होते हुए…
उसके होंठ अनजाने में ऊपर सरके…
और पत्थर की मूर्ति के माथे से
हल्के से लग गए।
बस एक पल के लिए।
लेकिन उसी एक पल में…
जैसे पत्थर ने धड़कना सीख लिया हो।
मूर्ति के माथे पर एक महीन-सी रेखा चमकी…
धूल अपने आप हवा में उठी…
और सुरंग की हवा अचानक भारी हो गई।
चारों लड़कों के कदम वहीं जम गए।
उनके गले सूख गए…
और आंखों में पहली बार नशा नहीं…
डर उतर आया।
क्योंकि उसी पल…
पत्थर के भीतर से एक धीमी-सी गूंज उठी…
धक…
धक…
जैसे कोई बहुत पुरानी चीज़
सदियों बाद जाग रही हो।
और फिर…
मूर्ति की आँखों के कोने से
एक लाल चमक फूटी…
इतनी हल्की कि कोई उसे भ्रम समझ ले…
लेकिन इतनी गहरी कि अंधेरा भी काँप जाए।
उसी क्षण, कहीं बहुत नीचे से
एक आवाज़ आई…
जैसे धरती ने खुद फुसफुसाकर कहा हो—
“शपथ… टूट गई…”
और लड़की…
मूर्ति की गोदी में निढाल पड़ी थी…
कैसा लगा आपको ये एपिसोड मुझे जरूर बताएगा 🥺
हेलो दोस्तों,
यह मेरी पहली नॉवेल है…
लेकिन सच कहूँ तो यह सिर्फ एक कहानी नहीं, एक श्रापित संसार का दरवाज़ा है — जिसे खोलने की हिम्मत मैंने पहली बार की है।
इन पन्नों में सिर्फ प्रेम नहीं है… यहाँ अंधकार है, पीड़ा है, प्राचीन रहस्य हैं, और वो टकराव है जहाँ दिल और दैत्य आमने-सामने खड़े होते हैं।
मैंने हर दृश्य को महसूस किया है — आग की तपिश, चाँदनी की ठंडक, और उस मोहब्बत की धड़कन जो शायद जन्म ही गलत समय में लेती है।
यह कहानी आसान नहीं है।
यह प्रेम सीधा नहीं है।
यह सफ़र सुरक्षित नहीं है।
अगर पढ़ते हुए आपको कभी लगे कि दिल तेज़ धड़क रहा है…
या लगे कि नफ़रत और चाहत की सीमा धुंधली हो रही है…
तो समझिए आप उसी दुनिया में कदम रख चुके हैं जहाँ से लौटना आसान नहीं।
मैंने इस कहानी में अपना डर भी रखा है और अपना साहस भी।
अब यह आपके हवाले है।
क्या आप उस अंधेरे में मेरे साथ उतरने के लिए तैयार हैं?
प्यार, आग और रहस्य के साथ,
– आपकी लेखिका sirfsadharan 🖤🔥


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